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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



शब्द –दर-शब्द


अनुपम सक्सेना


 
मैं शब्दों की दुनिया में 
दिन रात भटकता हूं 
कि शब्द ही अभिव्यक्ति का मध्यम हैं 
कि शब्द ही जोडते हैं
आदमी को आदमी से 
कि शब्द ही विचारधारा बनाते हैं 
और पीडा को भी स्वर देते हैं 
कि शब्दों से ही निर्धारित होती है
हमारी मानवता या दानवता 
कि शब्दों से ही व्याख्यायित होता है 
जीवन का दर्शन 
कि शब्दो से ही परिभाषित होते हैं 
धर्म और संस्कृति 
कि शब्दों की ईंट से ही 
साहित्य का हवेली खडी होती है 
कि शब्दों का भी एक विज्ञान होता है 

शब्द ही प्रहार करते हैं तलवार की तरह 
शब्द ही हैं जो औषधि की तरह काम करते हैं 
इसलिये मैं करता हूं उपासना शब्दों की 
और भटकता हूं शब्दों की दुनिया में . 
 

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