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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



लक्ष्मण रेखा


अनुपम सक्सेना


 
थोडी –सी सहानुभूति, कुछ संवेदनायें 
और प्रेम के कुछ शब्द मनुष्य के लिये पर्याप्त हैं 
लेकिन कई बार मनुष्यता अंधेरे में गुम हो जाती है 
और मनुष्य तब्दील हो जाता है 
सूखी हुई नदी, अधजली लकडी या फिर सूखे दरख्त में 
बहुत तेज रफ्तार जीवन में गुमनाम अंधेरे 
रोशनी में झूलने की कोशिश करते हैं 
और विश्वास दम तोडता जाता है
सरलता,अभिवादन और आदरसूचक शब्द निरर्थक मान लिये जाते हैं 
तब अपने अंदर के इंसान को खोजने 
हो सकता है वहां की यात्रा करनी पडे 
जहां थोडी सी मुस्कान के लिये आत्मा तक गिरवी रख दी जाती है 
जहां प्रकाश के एक पल के लिये सारा जीवन अंधकार में बिताना पडता है 
जहां जीवन नरक से भी बदतर है 
इस यात्रा में कई तो ऐसे मिल जाते हैं जो यह जानना चाहते हैं कि उन्हें 
नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात्रि में क्या परोसा जायेगा 
लेकिन कमी नहीं है ऐसे लोगों की भी 
जिन्हें जीवन में कभी स्वादिष्ट भोजन मिला ही नहीं है 
लेकिन हमारी संवेदनायें वहां पहुंचने में अक्षम  हैं 
और हम गर्व से घोषणा करते हैं कि –यही हमारी लक्ष्मण रेखा है.  

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