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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



तुम्ही बताओ


डॉ० अनिल चड्डा


 
कितनी नाकामियों का
सामना करूँ
सफलता की उम्मीद में
ये नाकामियां
ढारस तो बंधाती हैं
कि
उम्मीद कायम रखूँ
पर
हर बार
हिम्मत पर
एक 
कुठाराघात कर जाती हैं
जिससे उबरने में
समय तो
लगता ही है
साथ ही
हिम्मत भी खर्च होती है
तुम्ही बताओ
इतनी हिम्मत
कहाँ से लाऊँ
जो मुझे
हर बार 
सहारा दे कर
खड़ा कर
एक और
नाकामयाबी के लिये
तुम्ही बताओ।
 

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