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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



इन्सान ही बनना


अजय एहसास


 
सबका ही सम्मान तू करना ,
नहीं कभी अपमान तू करना 
हिंदू मुस्लिम बाद में बनना ,
पहले तू इन्सान ही बनना ।
तकलीफ़े न देना किसी को,
कभी किसी को दुखी न करना 
तकलीफों को सदा समझकर,
साथ निभा इन्सान ही बनना ।
बैर की आग बुझाना यारों,
नफरत की न खेती करना ,
अमन चैन खुशहाली लाकर
आप सदा इन्सान ही बनना ।
नहीं कभी धमकाना किसी को
सबको डराकर राज न करना 
सबके दिल पर राज करो तुम ,
ऐसा इक इन्सान ही बनना ।
उलझन तो आते जीवन में,
इनसे नहीं घबराना तुम ,
हर उलझन को खुद सुलझाकर
इक अच्छा इन्सान ही बनना ।
बांटे जो कोई हमको 'एहसास'
धर्म जाति के नारों पर,
लड़ के बिखर के नहीं टूटना ,
हाथ थाम इन्सान ही बनना ।
 

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