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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



भीखाभाई


रामदयाल रोहज


बड़े बड़े टीले के बीच बसा हुआ एक छोटा सा गाँव जो रेत के समन्दर में सचमुच एक कमल सा खिल रहा था | इसी गाँव में रहता था भीखाभाई |पूरे ऊँचे कद का काला कलूटा लेकिन शरीर से चौबर | शरीर व बल की तुलना में बुद्धि कुछ कम रह गई थी | होली से पहले बच्चों को हड़दड़ा खेलते देखता तो बच्चों की तरह दौड़ा चला आता और खेलने लगता |किसी के घर कोई डांगर-पशु मर जाता तो उसे गाँव से दूर डालकर आता |भूख लगती तो किसी द्वार पर जाकर कहता -

" ताई मेय पेट में भूखा ऊंदआ बोलै "

"जे ओटी ना खुआई तो बिच्याआ मय जासी "

ताई उसके भोलेपन पर हँसकर बासी-रोटी दे देती | एक बार एक घर में बिल्ली मर गई | भीखा को हुक्म मिला बिल्ली को दूर डालकर आए|

उसने उसे काख में उठाया और वही पास वाले घर के पलसे पर रखकर बोला-

" आकी आ देख बिल्लई पई पई सेना कय"

काकी को उसकी मजाक अच्छी नहीं लगी "मरजाने मरी हुई बिल्ली लेकर आया है " बेचारे की पीठ पर दो तीन बार झाड़ू जमा दी |

इस गाँव में छुआछूत अपनी चरम सीमा पर थी | गाँव का धोबी सिर्फ ऊँचे वर्ग के लोगों के ही कपड़े धोता था | एक दिन भीखा भी चला गया अपनी अँगरखी लेकर -

अय फूला भैया आ मेई एक अँगअखी धो दे याय "

" भीखा भाई मैं आपकी अँगरखी धो नहीं सकता "

" क्यूं भाई साआंगी ही धोअ नी "

"मेई क्यूं कोनी धौअ "

"अरे भाई तुझे तो पता है मैं ऊँचे लोगों का धोबी हूँ "

" यदि धो भी दूं तो मेरे सारे घर टूट जाएंगे" भीखा चुपचाप चला गया

सुबह आकर फूला ने देखा कि सिल गायब है | फूला गाँव के टिकाई ठाकुर के पास दौड़ा दौड़ा पहुँचा _

"ठाकुरसाब ! ठाकुरसाब ! मैं लुट गया "

" अरे क्या हुआ ? ठीक से बताओ "

"ठाकुरसाब मेरी सिल को कोई चुराकर ले गया "

" मेरी तो रोजी रोटी ........."

"अरे अपनी साँस तो टिकाओ भई | "

"चलो ! देखते हैं "

ठाकुरसाहब कुछ मुखिया लोगों के साथ जोहड़ पर पहुँचा तो सिल सचमुच गायब थी

" अरे फूला ! कितनी बड़ी सिल थी तुम्हारी"

" पूरे सात मन की सिल थी और वह भी बढिया पत्थर की "

एक व्यक्ति ने कहा " यहाँ कोई गाड़ी ;ऊँट या बैल के निशान तो नहीं है "

ठाकुरसाहब बोले " निशान है एक पुरुष के पैरों के निशान "

पैरों के निशानों का पीछा करने पर पता चला कि वे भीखा के ही पैरों के निशान है

ठाकुरसाहब ने भीखा को बुलाया -

" अरे भीखा तुमने ये काम क्यों किया "

"ठाकुअसाब अयं मेई अँगअखी कोनी धोई"

"अरे भई ! फूला तूं इसकी अँगरखी धो दिया करो "

" भीखा तूं जा और वापस उठा ला "

कुछ दिनों बाद उसी गाँव में राजा का पहलवान आ गया और ठाकुरसाहब के घर रुका | रात को ठाकुर साहब की चौकी पर बहुत से लोग हमेशा की तरह हताई करने के लिए आ गए |अम्मल व हुक्के की खूब मनुवार हो रही थी | हँसी मजाक से पूरा घर गूंज रहा था |

पहलवान दूड़सिंह बोला -

"ठाकुरसाहब ! कल सुबह गुवाड़ में आपके गाँव के पहलवान से कुस्ती होगी पहलवान दूड़सिंह की "

" यदि आप हार मानते है तो... तो आप दूड़सिंह को देंगे ...एक बोतल व ग्यारह सौ रुपये "

यह सुनते ही सबके माथे पर एक चिंता की लकीर फैल गई | सब एक का मुहँ देखने लगे मानों वे आँखों ही आँखों में कह रहे हो " अब क्या होगा "

क्योंकि उस समय ग्यारह सौ रुपये बहुत थे

रातभर किसी को भी नींद नहीं आई -

" कौन कुस्ती करेगा ? इस भीमकाय आदमी से "

लोग तो दूड़सिंह के नाम से कांपते थे | "इसने तो कितने ही पहलवानों को विकलांग बना दिया था | अब इसके साथ किसका हाथ भिड़ाएं और नहीं भिड़ाया तो ग्यारह सौ रुपये .... | " इसी चिंता में ठाकुरसाहब माथा पकड़े बैठे थे | तभी वहाँ फूला धोबी आ पहँचा

"क्यों चिंता कर रहे हैं ठाकुरसाब ! मैं आपकी चिंता का कारण समझता हूँ | छोड़ दीजिए सारी चिंता |भीखा है ना |"

" अरे टूट जाएगा बेचारा | क्यों मौत के मुहँ में डाल रहे हो "

" तो क्या हुआ साहब ! दो सेर चौपड़(घी)़ दे देंगे और जरुरत पड़ी तो बाँस की खपच्चियाँ बाँध देंगे ; आखिर धन और स्यान का सवाल है "

यह बात ठाकुरसाहब को उचित लगी | सुबह भीखा को संदेश भिजवा दिया कि कल उसे दूड़सिंह से कुस्ती करनी है |

सुबह गाँव का गुवाड़ सज चुका था |गाँव राणोराण इकट्ठा हो गया था |ठाकुरसाहब पधार चुके थे |दूड़सिंह लंगोट कसकर दंगल में अपने प्रतिद्वन्द्वी की प्रतीक्षा कर रहा था |ढोल के धमीड़ों से पूरा गाँव गूँज रहा था | कुछ लोग बातें कर रहे थे " यार ये तो भैंसा सा है भीखा का तो कचूमर ही निकाल देगा "

" बेचारे गरीब को यम के ही हाथों में सौंप रहे हैं इससे तो अच्छा था चंदा कर लेते "

" लेकिन भीखा अभी आया नहीं | लगता है बेचारा डरकर भाग गया "

ठाकुरसाहब ने एक आदमी को हुकुम दिया कि भीखा फौरन दंगल में हाजिर करो | इससे पहले ही भीखा के पास चमेली काकी पहुँच गई " भीखा ! हमारा गधा मर गया है दूर डालकर आओ"

भीखा खाल निकालने की छुरी लेकर कंधे पर गधे को उठाकर चला |रास्ते में ही वह पुरुष मिल गया ( जो उसे बुलाने आया था)

" अरे भीखा! गुवाड़ में तेरी प्रतीक्षा हो रही है जल्दी चल | पहलवान दूड़सिंह तुमसे कुस्ती को उतावला हो रहा है "

" न चान दूअसीं न देखां तो सई "

भीखा को आते देख गाँववाले " भीखा आ गया भीखा आ गया " स्वर से शोर मचाने लगे |

दूड़सिंह कसरत कर रहा था कभी उठक- बैठक निकालता तो कभी आगे पीछे टाँग चलाता | भीखा ने आकर धम्म से कंधे का बोझ गिरा दिया -

" अय भई के ऊँचो नीचो होवै "

" न घोय कय ने तनै पटकगे मैं खान काढनी है "

दूड़सिंह ने देखकर सोचने लगा "हाथ में सचमिच छुरी है और गधे को तो इसने ऐसे उठा रखा था जैसे रूई का थैला हो | यह मामूली तो नही;है तो बला |

" और इसकी शर्त भी करड़ी है ; यह तो जिसको पटकता है उसकी खाल निकालता है |"

" अय भाई चुप कियां खयो है ;घोए कआ ; फेअ मैं खान काढनी है "

पहलवान ने हार मान ली -

" मैं आपके साथ कुस्ती नहीं करुंगा "

पहलवान उसी दिन अपने गाँव चला गया | गाँव में उत्सव का माहौल था | लोग सब भीखा की प्रशंसा कर रहे थे |" भीखाभाई कमाल कर दिया तूने तो |"

ठाकुरसाहब फूले नहीं समा रहे थे " तूने पूरे गाँव इज्जत बचा दी मुझे तुम पर गर्व है "

ठाकुरसाहब ने अपने हाथ से उसे दूध पिलाया तथा पाँच सेर घी ईनाम दिया | अन्नदाता को जब इस बात का पता चला तो उन्होनें भीखा को बीकानेर बुलाने के लिए अपना असवार भेजा |ठाकुरसाहब ने भीखा को ले आने का भरोसा दिलाकर असवार को वापिस भेज दिया |

ठाकुरसाहब चिंता करते ठकुराईन से कह कह रहे थे "अन्नदाता ने भीखा को क्यों बुलाया है ? पता नहीं क्या सजा मिलेगी बेचारे को"

ठाकुरसाहब ने सुबह ही भीखा को बुलाकर सारी बात बताई तो उसकी पिंडी कांपने लगी | ऊँट पर पलाण मांडकर दोनों बीकानेर पहुँचे |

"घणी घणी खम्मा अन्नदाता "

"अन्नदाता! हम भीखा को साथ लेकर आए हैं ;हुक्म कीजिए "

" तेरी ये औकात ;हमारे पहलवान को धोखा देकर विजय प्राप्त की है "

"अब देखता हूँ तुम्हारी चालाकी "

भीखा का कलेजा धड़कने लगा |पूरा शरीर पसीने से तर बतर हो गया ; रोम रोम काँप उठा मुहँ से शब्द ही नहीं निकला सिर्फ पत्थर की मूर्ती की तरह हथ जोड़े खड़ा था

राजासाहब ने अपने मुख्य पहलवान सूरतसिंह को बुलाया _

" सूरतसिंह! इसे अपने हाथ दिखाओ "

सूरतसिंह ने भीखा से कहा कि इन पुच्छले पहलवानों को मात देने के लिए तो मुरचा बीणी ही काफी है |

"पहलवानसाब ! ले मेरा मुरचा पकड़ ; मैंने छुड़ा लिया तो जीत मेरी अन्यथा तुम्हारी "

भीखा ने उसके मुरचे को इतना कसकर पकड़ा कि रक्त संचार बंद हो गया; आँखें निकल आई ; दर्द के मारे कर्राने लगा |

राजासाहब ने प्रतियोगिता रुकवाई |

"भीखा ! तूने मेरे पहलवान को भी हरा दिया ; तुम तो सचमुच ईनाम के हकदार हो ; मांगो ! जो भी तुम माँगोगे ; मिलेगा"

"अन्नदाता! खई थाई पई म्हाई "

" सैनिको ! इसे पकड़ लो ; भाग न जाए "

और भीखा के पैरों तले की जमीन खिसक गई ;अचानक उसे किसी कवि की ये पंक्तियाँ याद आई-

राजा जोगी अगन जल जां री उल्टी रीत
डरता रहिओ परशुराम बे थोड़ी पालै प्रीत

अभी तो ये मुझे सम्मानित करने की बात कर रहै थे और अब बंधक बनाएँगे |सैनिक उसे पकड़कर राजा के सामने ले आए "

भीखा ! तुमने हमारे मल्ल को हराया है और साथ ही ईनाम के लिए मना किया है यह तुमने बहुत गलत किया है इसके लिए मैं तुम्हे कठोर सजा दी जायेगी"

पूरी सभा में सन्नाटा छा गया |राजासाहब के ये शब्द सुनकर हक्के बक्के रह गये

" तुम्हे आजीवन ... बनकर रहना पड़ेगा मेरा...पहलवान "

पूरी सभा करतल ध्वनि सै गूंज उठी मंत्री महोदय ने राजासाहब के कान में धीरे से

कहा " महाराज यह अछूत है "भीखा भी अन्नदाता इतने बङे पद के काबिल मैं कैसे हो सकता हूँ मैं तों..

"यह राम राज्य है यहाँ सभी बराबर है "

भीखा आँखों से आँसओं के माध्यम से कृतज्ञता छलक पड़ी |


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