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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



तेरे सँग ही बस अब राहत मिलती है


शुचि 'भवि'


                         
तेरे सँग ही बस अब राहत मिलती है
तुझसी बोल कहाँ भलमनसाहत मिलती है

पहले मिलती थी हरियाली दुनिया में
अब तो पन्नों में ही क़ुदरत मिलती है

करने को कर लेता हर एक शख़्स यहाँ
आज भलाई से यदि इज़्ज़त मिलती है

कितने होंगे जिसने उनको मान दिया
नौकर बनी ही अब तो औरत मिलती है

अपने कर्मों को तो 'भवि' वो भूल गया
ऐसे थोड़े सबको मुसीबत मिलती है

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