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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



जीवन पिघलता रहा


शुचि 'भवि'


                         
साथ उसका मुझे देखो खलता रहा
और कैसा ये नाता कि पलता रहा ।।

मुफलिसी में जो जीवन पिघलता रहा
सोने सा वो हमेशा दमकता रहा ।।

जन्म मेरा हुआ इक सड़क ही सा क्यूँ
हादसों से मुसलसल गुज़रता रहा ।।

वो ग़ज़ल थी कोई या कोई नज़्म थी
वाह वाही से जीवन ये चलता रहा ।।

राम ही कह लिया कुछ ने बोला खुदा
हर बशर में मगर वो तो रमता रहा ।।

ये तिरा शह्र था और न होगा "भवि"
इक सराय कि माफ़िक बसेरा रहा ।।

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