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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



क्या है क़ीमत भावों की


शुचि 'भवि'


                         
बाँहों   में   आकाश   सजाकर
मिलते   तुम   दीवार   गिराकर

माना  पागल  तुम  भी हम भी
रखते  हैं    हर    दर्द   हँसाकर 

है  अदृश्य बंधन  दो  मन  का 
रखना  है  यह  हमें   निभाकर

नहीं  स्वर्ग  का भी सुख भाता
मुझको  साथ  तुम्हारा  पाकर

दुनिया  ने  बस  दर्द   ही   दिए
कभी मिलाकर कभी मिटाकर

सिर्फ़   मिलूँगी  रुह  में  मैं  तो
देखो  तो   मुझको  पिघलाकर

हम तुम  शायद  ही  मिल पायें
सपनों   का   संसार   जलाकर

जाने  कितने   दीप   बुझ   गये 
 तूफ़ानी   गति   से   टकराकर

भूखा    बच्चा   सो  जाता   है
तुम   बैठे  हो   थाल  सजाकर

अन्न   ब्रह्म   वो  हो   जाता  है
हर  भूखे  की  भूख   मिटाकर

'भवि' क्या है क़ीमत भावों की 
देखो  तो  बस  स्वार्थ भुलाकर

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