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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



महाकवि नीरज


सुशी सक्सेना


नीरज की पाती मिली,मुझे आज अलभोर।
हंसते हुए वो चले,छोड़ जगत का शोर।


गीत बुलाती कल्पना,कविता के अंदाज।
अब जाने कब आएगी,नीरज की आवाज़।


शिल्प कला में निपुणता,भाषा शुद्ध सरोज।
शब्दों के विन्यास से,गीतों में है ओज।


शब्द शब्द मणि सरस हैं,भाव भक्ति से प्रोत।
गीत ग़ज़ल कविता बनी,विमल भाव की स्त्रोत।


जीवन दर्शन प्रेम पर,है आधारित गीत।
नीरज ने चुन चुन लिखीं,दर्द भरी वो प्रीत।


कविता उनकी प्रेमिका,कविता ही आराध्य।
कविता से सांसे शुरू,कविता जीवन साध्य।


नीरज को जिसने पढ़ा,चढ़ा न दूजा रंग।
उनके गीतों में मिली,प्रेम प्रीत की भंग।


यादों में नीरज बसे, गीत ग़ज़ल सी धूप।
जीवन के संघर्ष में,कविता के प्रतिरूप।


एक सितारा टूट कर,चला गया आकाश।
हम सब को वो दे गया,साहित्यिक विश्वास।

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