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साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



कुरुक्षेत्र


लेखक: स्व.डॉ.सुरेश जोशी
अनुवादक: डॉ.रजनीकान्त एस.शाह


रात दो बजे मैंने घर में पैर रखा। घर के भीतरी अंधेरे में आँख में छाई हुई गली के बिजली के दिये के प्रकाश की कनकी गडने लगी। घर के एक कोने में लालटेन की महीन ज्योत को कुछ बढाया। उसके टूटे हुए काँच के गोले(चिमनी) से हवा भीतर जाने से उसकी ज्योत कांपने लगी।

उसके कांपने के साथ सभी वस्तुओं की छाया भी कांपने लगी और मुझे लगा कि समूचा घर तूफान में फंसे जहाज की भांति डोलने लगा है। मैं माथे पर रही अलगनी को पकड़कर तनिक खड़ा रह गया। शहर की गलियों में भटककर सांस के साथ अंदर लिया हुआ अंधकार धीरे धीरे भारी होकर शरीर में कहीं नीचे बैठने लगा। उसके भार से मेरे पैर कुछ ढीले पड़ गये। एकाध सिगारेट फूंकने का मन किया,लेकिन एक भी बचा नहीं था। बिछौने के पास भरकर रखे हुए लोटे से पानी पिया। बिछौने के छोर पर बैठकर मैंने यहाँ-वहाँ देखा। आगेवाले कमरे के किवाड के पास बुढ़ऊ माथे तक धोती ओढ़कर सोये हुए थे। –सीधे सपाट; मानो अब अर्थी पर ही सोना बाकी बचा हो! उनकी ज़िंदगी के टेढ़ेमेढ़े पैसठ बरसों को बड़ी मुश्किल से चिता की लकड़ियों की भांति एक पर एक रखकर उस पर मानो चैन से सोये हुए थे। रसोईघर की नमी की गंध के बीच माँ और भाभी सोई हुई थीं। आज बड़े भैया के `नाईट’ थी। इसलिए बीचवाले कमरे में हमें गृहस्थाश्रम भोगना था। नींद के दु:शासन ने भाभी के वस्त्र अस्तव्यस्त कर दिये थे। माँ की दंतविहीन पोपली उनकी सुँघनी की डिबिया की भांति आधी खुली रह गई थी। बिछौने में बगल में मेरी पत्नी सोयी हुई थी।-`पत्नी’ शब्द का भी भार सह नहीं सके ऐसी छोटी। उसके सिरहाने पर `सोमवार के व्रत की कथा’ की किताब पड़ी हुई थी। उसका मुख और आँखें अधखुली थी और वह एकदम सीधी सोयी हुई थी। वह मर जायेगी तब उसका चेहरा ऐसा ही लगेगा और मुझे उसका मुंह और आँख बंद करना पड़ेगा।–ऐसा विचार, पता नहीं मेरे मन में क्यों आया?

बाहर से जो ठंड लाया था वह धीरे धीरे आसपास की गर्मी में सोख गया और मैं लालटेन को कम करके बिछौने में लेटा। पास में सोयी हुई नारी के अबोध चेहरे पर छायी हुई मूढ़ता को देखकर मुझे हंसी आई। अनजाने ही उसने कितने बड़े साहस की चुनौती स्वीकार कर ली थी! हर पल हजार ढंग से हजारों खंडों में छिन्नभिन्न होकर भटकनेवाले मुझे वह पुन: उसके छोटे से गर्भाशय में एकत्र करके अवतरित करना चाहती थी! कैसी बेपरवाही से सोयी थी! सोमवार के व्रत का आधार पाकर वह निश्चिंत थी।

गोह की जिह्वा की भांति दिये की धुंधली लौ लपलपाती रहती थी। कुछ देर बाद साहस जुटाकर चूहों ने उनकी प्रवृत्ति शुरू कर दी। मैंने आँखें मूँद ली। दिवस दरमियान देखे हुए अनेक दृश्यों के टुकड़े यहाँ से वहाँ धुरा रहित ग्रह की भांति टकराने लगे। दिवस के दरमियान सुनी हुई अनेक आवाजें भी हल्की सी सुनाई देने लगी। यह सब मेरे साथ लगा ही रहता है। नींद में भी यह सब आसपास चक्कर काटता ही रहता है लेकिन आजुबाजु चल रही बातें सुनता हूँ या उनसे जुड़ता हूँ। तब भी मेरा उसमें लक्ष्य नहीं होता। मेरा मन तो उससे कहीं दूर चला गया होता है। इसलिए कभी कभी जानबूझकर बनावटी जोश लाकर दलीलबाजी शुरू कर देता हूँ। सामान्य सी बातों में निराशोन्मत्त होकर जूझते रहने की आदत जो लग गई है। एक प्याला पानी पीना हो तब भी!

और इसीलिए तो मनुभाई मास्टर की चन्द्रकान्ता को तमाचा जड़ दिया। मैं गोरी के गीत लिखता हूँ। इसलिए वह मुझ पर फिदा है। फागुन और सावन,राधा और श्याम-कुछ शब्द इधर उधर जमाता हूँ। उसकी आड़ में मैं अपनी थोड़ी सी भूख को भी छिपाकर तरतीबवार रख देता हूँ। चन्द्रकान्ता उस गीत को जब गाती है,तब सुनना अच्छा लगता है। बाद में,अपनी आदत के अनुसार भावों को कुछ ज्यादा ही खींचता हूँ। तेरह साल की चन्द्रकांता की चिबुक पकड़कर कह देता हूँ: चन्द्रा! तू ऐसा मीठा गाती रहो तो तुम्हारे आगे गीतों का ढेर लगा दूँ-पारिजात जिस प्रकार फूलों का ढेर लगा देता है ऐसे। चंद्रकांता यह आकस्मिक प्रणयोक्ति सुनकर मूढ़ बनकर चकित भाव से देखती रहती है। उसकी सखियाँ नीचे गोल गोल घूमती रहती हैं,नाचती हैं,फुदकती हैं और चंद्रकांता जैसी मूढ़ यहाँ बैठी हुई है। वह एकाएक मेरी गोद में माथा रखकर उसकी आँखेँ मेरी आँखों से मिलाती है। पता नहीं क्यों मैं त्रस्त हो जाता हूँ। उसकी इस अकाल प्रेमचेष्टा से मैं जुगुप्सा अनुभव करता हूँ। मुझे बिजली का धक्का लगा हो ऐसे खड़ा हो जाता हूँ,चंद्रकांता गिर जाती है और पैरों से लिपट जाती है। मैं नीचे झुकता हूँ- उसका हाथ पकड़कर खड़ी करने के लिए,पर उसको आँखों में रही विह्वलता,उसके हाथ की पकड़ में रही लोलुपता मुझे उत्तेजित करती है और मैं उसे खींचकर एक तमाचा रसीद करके चला आता हूँ।

इस लालटेन की धुंधली ज्योत आँख की बंद दोनों पलकों पर नाचती रहती है,चंद्रकांता के उन दो विह्वल हाथों की तरह लिपटती रहती है। मुझ से नहीं रहा जाता। मैं अब उसे बुझा देता हूँ। बस,अब तो मुंह में सिगारेट हो तो मजा –उसका झपकना अंधेरे में देखते रहना अच्छा लगता है, लेकिन बिछौने में सोते हुए उसका हाथ मेरे करवट बदलने में दब जाता है कि मुझे याद आता है: केतकी मेहता `हेवमोर’ में जब चाय के प्याले में चाय उंडेलती थी तब उसका खुला रहा आधा हाथ कैसे कांप रहा था! हाथ पर फैले रोयें, कुहनी से उपर के हिस्से की मसृण मांसलता –सहज श्रम के कारण उसके चेहरे पर ललाई कैसी दौड़ जाती थी! मैं चाय की धार को देखता था,फ़्लोरोसेंट लाइट के तेज में सराबोर उस हाथ को देखता था। चाय की गरम भाप से जुड़ती उसकी रेशमी साड़ी से आ रही महक का मजा लेते हुए कुछ बोलता जाता था। पुन: वह हाथ उसकी साड़ी में छिप गया और मैं अन्यमनस्क हो गया। किसी भी स्त्री को मैं पूरी देख ही नहीं सकता। उस स्त्री का व्यक्तित्व अंग के किसी भाग में आकर बसता है ऐसा मैं मानता हूँ,और मुझे उसकी परख भी है कि स्त्री को देखते ही मुझे उस अंग का पता चल जाता है। कोई पैर हिलाती है,कोई बिला वजह पुन: पुन: गरदन मरोड़कर पीछे देखती रहती है। कोई रह रहकर बालों में उँगलियाँ पिरोती रहती हैं। किसी के होठ फड़कते रहते हैं। बस,तत्पश्चात मैं कुछ भी नहीं देखता। पर मेरी पत्नी नींद में उसके पति के स्पर्श का मजा नहीं ले पाती: वह छोटे मातृ रहित बच्चे की तरह कुछ असपष्ट बडबडाती रहती है और करवट बदलकर गहरी नींद में सो जाती है। वर को बश में कर लेने की, उसकी अनुभवी सहेलियों द्वारा दी गई सारी सीख इस नींद के कारण व्यर्थ हो जाती है और वह किशोरावस्था की सृष्टि के सपनों में विहार करती हुई पड़ी रहती है। अंधेरे में उसके शरीर की रेखाओं का हल्का सा आभास नजर आता है: और वैसे भी अंधेरे में मेरी कल्पना ज्यादा सतेज हो जाती है। रीटा का छटा से बंधा हुआ `पोनीटेल’ जुड़ा, रेखा का वार्तालाप –बात करते करते रुककर आँख मटकाकर पुन: बात की डोर थाम लेने की उसकी रीति, उसकी आवाज-मैं उसकी बात सुनता हूँ तो मात्र उसकी आवाज के कारण,मैं उसकी बात से कोई अर्थ नहीं निकलता। पर उसकी आवाज – मधुर कही जाए ऐसी नहीं है। फिरभी बहुत अच्छी लगती है। वह आवाज एक वातावरण की रचना करती है। उस आवाज को सुनने पर ऐसा लगता है, जैसे उसने हमारे आसपास,एक अर्द्ध पारदर्शी पर्दा लगा दिया है। उस आवाज का स्वाद (जायका) भी है-पीच जैसा। मिठास भी है,पर उसमें सह्य कड़ुआहट भी, इसलिए ज्यादा भाती है। हाँ, उस रेखा की आवाज,मीनल की बारबार वक्र होती भ्रमर, पवन में डोलती हुई वृक्ष की शाखा की तरह देह को अकारण हिलाते रहने की शीलु की आदत-अंधेरे में ये सारे टुकड़े मैं इकट्ठा करता गया। उन सब में से अंधकार के गर्भ में मैं एक नयी नारीमूर्ति रचने लगा। मेरे पास रही नारीदेह की रेखाकृति में उन सारे टुकड़ों को मिलाकर जोड़ने का मन करता है। उचटी हुई नींद बंद की हुई आँखों को जलाती है, नसों में रहे लहू की धडकन मंद पड़ती है और मेरे शरीर में रहे हृदय की धड़कन सुनायी देती है। अभी अभी ही पत्थरों से मढी गली के सुनेपन को मेरी पदध्वनि ने ऐसे ही स्पंदन से हिला दिया था! आवाज भी कभी कभी पीछा कर लेती है। नींद के भार से लदी पत्नी की देह को मैंने अनुकूल ढंग से घुमाया। उसका एक पैर आधा मुडी हुई दशा में ही ऊपर उठा हुआ रह गया। कुछ देर वह उस स्थिति में रहकर मेरी ओर गिरने लगा था। आखिरकार एक झटके के साथ वह मेरे ऊपर आ गिरा। मैंने अपने मन में एकत्र किये हुए उन टुकड़ों को पुन: जांच-परख लिया। -शीलु की पवन में झूलती हुई वृक्ष की शाखाओं की तरह अकारण झूलती हुई देह - पर उस पैर द्वारा उस देह पर रहा नींद का भार मुझ पर बरबस आने लगा। फिरभी परवश होकर मैं ज्यादा से ज़्यादातर भारी होते जा रहे उस पैर के नीचे पड़ा रहा कि बुढ़ऊ खंखारते हुए खड़े हुए। आगेवाला किवाड़ खोलकर बाहर गये, बाहर की हवा अंदर आई, दरवाजे से गली की बत्ती का प्रकाश भी लुकते छिपते आया और मैंने अपने ऊपर रहे पैर को हटाने का साहस कर ही दिया।

पुन: किवाड़ बंद हुआ। बाहर भागने को उतारू घर की अवरुद्ध हवा सिर पटककर अंदर पछाड़ खा गई। पुन: अंदर की गर्मी बढने लगी। उस गरम हवा के साथ पास रहे माथे में लगाए केशतेल की बू मिलने से मेरी सांस घुटने लगी। वैसे अकेले हाथ अनेक रिपुओं से जूझते पौराणिक काल के महारथी की भांति पड़ा पड़ा टक्कर लेता रहा और उस टक्कर के प्रयास में मैंने पास में रही पत्नी की देह को खूब हिलाया। वह कुछ बड़बड़ाई: हें कौन? मैंने धीमी आवाज कहा,`ये तो मैं हूँ।’और वह एकदम बैठ गई। मैंने पूछा: क्या करती हो? उसने कहा, मैंने आपके लिए दूध तैयार रखा है,मैं अभी ले आती हूँ। मैंने कहा, छोड़, मुझे नहीं पीना। वह कुछ बोलने ही जा रही थी, कि मैंने यकायक उसका हाथ खींचकर अपने पास खींच लिया। अंधेरे में मेरे मुख का त्रासद भाव उसे दिखा नहीं। अत: उस भोली को तो यह प्रणयक्रीड़ा ही लगी। वह मेरे पास सरक आई और असहाय शिशु की भांति छिपने लगी। उसके पास आने से मेरे उत्ताप की मात्रा बढ़ती चली, मेरी सांस घुटने लगी। बाहर की गली में दौड़ जाने की इच्छा हुई पर वे दोनों हाथ मेरे आजुबाजु लिपट जो चुके थे।–गाँव के सीवड़े में पेड़ की डाली पर झूलते, कुए से पानी खींचते,अहाते में उपले थाप रहे वे दो हाथ। वहाँ पड़ोस के दामुदादा को खांसी का दौरा पड़ा। उन्होंने कफ का बलगम निकाला,कुल्ला किया,चार बार `हे प्रभु’बोलते रहे। और फिर शांति छा गई।

वही अंधकार और वही नि;स्तब्धता-उसके तल में स्पंदित दो जीव। हम दोनों कुछ सृजित करने की कोशिश में थे। टूटे-फूटे संसार के टुकड़े में से मैं कुछ जोड-जाडकर रचने का प्रयत्न करता था। पर सृष्टि अंधकार में रचती है। माता के गर्भाशय के अंधकार में शिशु पुष्ट होता है। मेरे पास इतना अंधेरा नहीं था। इसलिए तो मैं भटक भटककर अंधकार से छूट रहा था और मेरे पासवाली यह नारी – मेरे छिन्नभिन्न अंशों से अर्क निकालकर गर्भ में उसका आकार रचने की कोशिश में थी। माता के गर्भाशय में अंधेरे की कमी नहीं है। वह तो जन्मोजन्म से चला आता है। मैं मन ही मन गुस्साया। ऐसे धारदार टुकड़े उसे दूँ कि गर्भ के अंधेरे में जुड़े नहीं, उसके शरीर की नसों को छिन्नभिन्न कर दे-ऐसे जुनून के साथ मैंने अपना शरीर उसके पास ढकेला।–इस घर का मौन,इस घर की पीड़ा,इस घर में टुकड़ों में बिखरे जीव-उन सबकी याद के साथ मैंने अपना शरीर उसे सौंपा। माँ पानी पीने के लिए खड़ी हुईं। मेरी पत्नी के दोनों हाथ मेरी पीठ से जोंक की तरह चिपक गये। हम दोनों के बीच दब-कुचलकर गर्मी और असह्य हुई। वह गर्मी शरीर में सर्वत्र फैलने लगी- लावा की भांति। आँखें बहुत जलने लगीं। चौमासे में पैदा होते हजार पैरोंवाले जीव की तरह मेरा शरीर हजार हजार पैरों से चलने लगा। यकायक किसीने मानों वेग से आती नींद की बाढ़ को रोकने के लिए बांधे हुए बांध को किसी ने तोड़ दिया हो,मैं पछाड़ खाकर गिरा।

उस तंद्रावस्था में मेरे मन के समक्ष एक चित्र खड़ा हो गया। विशाल रणक्षेत्र पर पड़े शरीरों के ढेर के बीच मैं पड़ा हूँ। मैं अखंड नहीं हूँ। एक हाथ यहाँ है,दूसरा कहीं दूर, माथा कहीं दूर लुढ़का पड़ा है। वहाँ मशाल जलाकर मेरी पत्नी मुझे खोजती हुई मेरे पीछे आ जाती है। वह मेरे अंग बटोरती है। उसकी मांग में सिंदूर है, उसके हाथ में कुमकुम। वह अपने हाथों चिता जलाकर मुझे गोदी में लेकर चिता में प्रवेश करती है। जलती हुई ज्वाला हमें लपेट लेती है। मैं बस जलता रहता हूँ। आखिरकार असह्य हो जाने पर आँखें खोल देता हूँ। बाहर धूप है,उसके तीक्ष्ण टुकड़े मेरी आँख पर बिखरे हुए हैं। मैं बैठता हूँ,आँख अभी भी जल रही है। खड़ा होकर रसोईघर में जाता हूँ। माँ मेरे लिए ढँककर रखी हुई चाय गर्म करके मुझे देती है। उसमें धुएँ का स्वाद है। मैं उसे अमृत की तरह पीता हुआ बैठा रहता हूँ और अहाते में चूल्हे की राख के ढेर पर बीखरी हुई धूप के भटकते हुए टुकड़े को देखता हूँ। यकायक एक कविता की पंक्ति का स्फूरण होता है: कुरुक्षेत्र पर उन्नीसवे दिवस की पौह फटी है। सुहागिन के खंडित कंगन जैसा प्रकाश बिखरा हुआ है। सहमरण की वधू के हाथ से झर रहे कुमकुम की तरह वह पूर्वक्षितिज की हथेली से झर रहा है....बाहर पढ़ाई करने बैठे छोटे भाई के पहाड़े बोलने की आवाज के साथ मेरी काव्यपंक्तियाँ उलझ जाती हैं। मैं अपंग बालक को रास्ता दिखा रहा हूँ, ऐसे इर्दगिर्द बढ़ती हुई आवाजों के बीच होकर जिसने अभी चलना सीखा नहीं है ऐसी मेरी छोटी कविता को लेकर बाहर ले जाता हूँ। बाहर की प्रचंड धूप में उसकी आँख खुलती नहीं है। मुँदी हुई आंखवाली उस कविता का चित्त में कहीं संगोपन करके पुन: रात्रि के सन्नाटे भरी रात की प्रतीक्षा करता हूँ। उस अंधकार में मेरी कविता आँख खोलेगी, इस उत्साह के साथ दिन के दूसरे छोर तक पहुँच जाने का मैं साहस जोड़ता हूँ।


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