Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



जियो ने की मुफ्तखोरी की राहें आसान


सुदर्शन कुमार सोनी


जियो ने आबाल , बाल , वृद्व नारी को मुफ्तखोरी की एैतिहासिक लत लगायी है। आज दो कमरांे के मकान मे रहने वाले परिवार के सदस्य मां बेटी , पिता बेटा एक कमरे से दूसरे कमरे मे आवाज देकर या जाकर बात नही करना चाह रहे । छोटी छोटी बात के लिये मोबाईल पर संदेशा खेती कर रहे हैं। एक बानगी , बेटे आ जाओ खाना लग गया है। जब एक कमरे से दूसरे मे जाने मे कंटारी आ रही हैं तो नीचे से ऊपर के कमरे मे चढ़ने का तो सवाल ही नही पैदा होता है जियो ने मुफ्तखोरी को इत्ता सिर पर चढा़ दिया है। अब तो यह भी हो रहा है कि एक बडे़ कमरे के दो कोनों मे खडे़ बैठे बाप बेटे , मां बेटी या परिवार के सदस्य आपस मे बात करने मोबाईल का उपयोग कर रहे हैं। कर्टसी जियो का मुफ्तखोरी का प्लान। तन्मयता से मुफ्तखोरी कर लेने के बाद भी तीन सौ तीन मे चाहे जितनी बात कर लो। पत्नि पति को कार्यालय मे काम नही करने दे रही है जियो ने जियो और जीने दो को बढा़वा दिया है कि खत्म कर दिया है निर्णय करना मुश्किल है। वह काम करने बैठता ही है कि जियो की सिम से काल आ जाता है कि लौटते मे आलू टमाटर भटा भाजी ले आना , अदरक धनिया नही है , जरा बनिया के यहां से चाय पत्ती चीनी ले आना। कुछ नही तो जियो मोबाईल उसे मजबूर कर देगा तो वह एैसे ही मेसेज कर देगी कि क्या कर रहे हो ? इसके पहले भी कुछ न कुछ पति करता ही था , लेकिन कभी यों दिलदारी से दिन मे कई मर्तबा मैसेज नही आते थे। यही ताने मारे जाते थे कि अकेले तुम हो जो कि काम कर रहे हो ? दुनिया के पति कार्यालय मे काम ही तो करने जाते हैं। जियो के मुफ्त प्लान दिमाग मे नये नये आयडिया देते रहता है। इसने भारतीयों की सृजनात्मक क्षमता को बढा़ने मे अभूतपूर्व योगदान दिया है । दोस्तो से दिन भर बात हो रही है। पे्रमी पे्रमिका एक दूसरे से जितना नही चिपकते होंगे उससे ज्यादा जियो से चिपके रहतें हैं , बात ही खत्म नही होती ? न कहो कि आमने सामने भी आ जाये तो और कुछ करने की अपेक्षा मोबाईल पर ही बात करना पसंद करें । आखिर मुफ्त का मामला है न !

यही सोचते सोचते और सही कहें कि जियो का मोबाईल यूज करते करते थकान के कारण हमारी नींद लग गयी। अब मुफ्तखोरी के ’जियो और जीने दो’ के कारण हमे सपने भी वैसे ही आने लगे। हम क्या देख रहे हैं कि माय कार जैसी कई टवल एजेंसीज जियो की तरह का प्लान लेकर आयी हैं। पंजीयन कराने पर चार माह तक राईड पूरी तरह मुफ्त ! नींद मे भी दिल बाग बाग हो रहा था । हम पूरे शहर मे मुफ्त राईड का मजा लेते घूम रहे थे। एैसीं ही मुफ्त खोरी के प्लान लाने के लिये अन्य एजेंसिया भी मजबूर हो गयी थीं । हम नींद मे अब और क्या देखते हैं कि डाकिया आया एक दो पत्रिकाओ के आफर पत्र लाया है । हमने खोलकर देखा तो पता चला कि मुफ्तखोरी का प्लान इन्होने भी लांच किया है। साल भर के लिये कई नामी पत्रिकाये मुफ्त बाद मे एक तिहायी कीमत पर दो साल पत्रिका घर पर दिल फिर से बाग बाग हो गया है। आजीवन मुफ्त तक के प्लान आ गये थे । बस एक छोटी सी रकम एक मुश्त देनी थी फिर ’आजीवन पढ़ते रहें आगे बढ़ते रहें। पत्रिका से हम सीधे उडा़न पर आ गये थे। पत्रिका हम उडा़न मे पढ़ रहे थे । स्वप्न लोक है कुछ भी हो सकता है पल भर मे जमीं से आसमान मे उठा दे और दूसरे पल आसमां से जमीन पर पटक दें। उडा़न भी पूरी मुफ्त थी कोई सात सौ बासठ या नौ सौ निन्यानवें वाले सस्ते प्लान नही थे। एैसे प्लान भी थे कि कुछ राशि एक मुश्त दें तो पांच साल व दस साल तक की उडा़ने सपरिवार मुफ्त थी। मुफ्तखोरी मे लोग इतने मस्त हो रहे थे कि वे यह भी सोचने तैयार नही थे कि यह सब कंपनीज करेंगी कैसे। काम्पीटीशन में कंपनिया एक दूसरे को मिटाने सनम हम तो डूबेंगे साथ तुम्हे भी ले डूबेंगे की तर्ज पर आतुरता की प्रतिस्पर्धा कर रहीं थीं। जियो का यह मुफ्तखोरी का वायरस हर इंडस्टी मे फैल गया था।

पेशे जिस तरह से बदनाम था। उससे तो यह विश्वास ही नही हो सकता था कि एैसा भी हो सकता था। शहर के बडे़ बडे़ हास्पिटल फुल बाडी चैकअप मुफ्त कर रहे थे। साल भर के इलाज की व्यवस्था मुफ्त मे हो रही थी। उनके एक प्लान भर को आपको सब्सका्रईब करना था। आपरेशन तक एक चैथाई दरों में किये जा रहे थे । एक बाईपास होने पर पांच साल के अंदर समस्या होने पर दूसरी मुफ्त के प्लान आ गये थे। ब्लड बैंको मे खून अब मुफ्त मे ही मिल रहा था। हर जगह रिचार्ज व्हाऊचर के माध्यम से यह सब हो रहा था। मुफ्तखोरी का माहोल देखकर लगता था कि रामराज्य आ गया है। निजी कालेजों का भी हृदय परिवर्तन हो गया था। शिक्षा क्षेत्र में एक से बढ़कर एक मुफ्त प्लान आ गये थे । एक साल की मात्र फीस देने पर पूरे तीन साल और पांच साल कोई फीस नही के प्लान आ गये थे।

मुफ्तखोरी के सारे रिकार्ड तो बैंको ने तोड़ दिये थे , लाकर का कोई चार्ज नही था । एक या दो प्रतिशत पर लोन मिलता था । एक लोन मुफ्त मे तो दूसरे में मात्र दो प्रतिशत ब्याज लगता था । बैंको मे जबरदस्त कांप्टीशन चल रहा था । रात की शाखायें भी खुल गयी थीं । चैबीस घंटो चैनलो की तरह चैबीस घंटो के बैंक खुल गये थे ।

एम्यूजमेंट पार्को मे प्लान आ गये थे , एक बार केवल पैसा दें पूरे साल भर घूमना मुफ्त में। टेवल एजेंसीज भी व्हाऊचर जारी कर रहीं थीं। पूरी व्यवस्था मुफ्तखोरी की थी जंहा पहले लाख रूपये मे आप इन डेस्टिनेशन पर घूम सकते थे अब दस हजार मे ही धूम मचा सकते थे ! किसी को समझ मे नही आ रहा था कि यह सब कैसे होगा लेकिन काम्पीटीशन मजबूर कर रहा था । उपभोक्ता की बल्ले बल्ले हो रही थीं।

आखिर सरकार को हार कर काम्पीटीशन कमीशन का गठन करना पडा़ था । जिससे कंपनिया डूबने से बचे और कम से कम लागत तो वसूल कर लें अपने कर्मचारियों को तनख्वाह वगैरह समय पर देवें। मुफ्तखोरी के हर क्षेत्र मे प्लान देखकर लेकिन एैसा लग रहा था कि अर्थ व्यवस्था का डूमस डे आने ही वाला है !

www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें