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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



हिंदी साहित्य में भारतीय दृष्टिकोण


गुंजन अग्रवाल


दिल्ली से प्रकाशित हिंदी-द्वैमासिकी ‘भारतीय धरोहर’ के अंक मई-जून, 2017 में वरिष्ठ पत्रकार और ‘धरोहर’ के कार्यकारी संपादक श्री रवि शंकर का विस्तृत निबंध "भारत को समझने की शर्तें" पढ़ा। यह लेख वस्तुतः प्रसिद्ध विचारक और लेखक प्रो. सूर्यकान्त बाली की पुस्तक ‘भारत को समझने की शर्तें’ की प्रतिक्रियास्वरूप लिखा गया है, जिसका विगत 22 फरवरी, 2017 को विमोचन हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबले, आदि ने इस ग्रंथ का विमोचन किया। ‘भारत का इतिहास दस हज़ार वर्षों का माना जा सकता है’— ऐसा उस कार्यक्रम में निश्चित हुआ।

रवि जी ने अपने लेख में इस विषय को विस्तार से उठाया है और सूर्यकान्त बाली जी की अच्छी ख़बर ली है। सूर्यकान्त बाली के पिता श्री चन्द्रकान्त बाली ‘शास्त्री’ भी भारतीय वाङ्मय के अच्छे ज्ञाता और विद्वान् थे, यह बात कम लोग ही जानते हैं। मैंने उनके कुछ लेखों को पढ़ा है। उन लेखों से उनकी भारतीय दृष्टि का पता चलता है। ख़ासकर पौराणिक कालगणना के प्रति उनकी दृष्टि बड़ी सुस्पष्ट थी। दुर्भाग्यवश वह दृष्टि सूर्यकान्तजी में न आ सकी। सूर्यकान्त बाली जी की एक और पुस्तक बड़ी चर्चित हुई है— ‘भारतगाथा’। वह पुस्तक धारावाहिक रूप में ‘भारतीय पक्ष’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी अथवा ‘भारतीय पक्ष’ में प्रकाशित लेखों को ‘भारतगाथा’ नाम से पुस्तकाकार रूप दिया गया। अब तो ‘भारतीय पक्ष’ बन्द भी हो गई है, अस्तु! ‘भारतगाथा’ में भी भारतीय दृष्टिकोण का अभाव दिखता है। परन्तु यह पुस्तक संघ-परिवार में समादृत हुई और प्रायः सभी प्रचारकों के झोले में मिल जायेगी।

रवि शंकर जी ने जो विषय उठाया है, वह बिल्कुल समीचीन है। वस्तुतः जिन लेखकों (उदाहरणार्थ— आचार्य बलदेव उपाध्याय, डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी, लोकमान्य तिळक, बी.बी. लाल, प्रो. सूर्यकान्त बाली, एम.ए. नरसिंहन, एन.एस. राजाराम, इत्यादि) को हम अपना माई-बाप मान रहे हैं, जिनको अपने सिर पर ढो रहे हैं, जिन्हें उद्धृत कर रहे हैं, वे लेखक हमारी ही पीठ पर छुरा मार रहे हैं! भारतीय वाङ्मय की दो-चार बातों की प्रशंसा करके अपनी रचनाओं में चोरी-छुपे ज़हर घोलना और इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना इन लेखकों का पेशा है, इसी के बल पर वे दशकों से ‘मूर्धन्य विद्वान्’ का तमगा अर्जित किए हुए हैं।

मैं विगत एक दशक से इस विषय पर लिख रहा हूँ और कई मंचों से इस बात को उठाया भी है। मुझे स्मरण है कि दिनांक 25-26 जून, 2011 को ‘अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना’ की वार्षिक साधारण सभा की बैठक पालनपुर, गुजरात में आयोजित थी, मैं पटना से वहाँ गया था। वहाँ अ.भा. इतिहास संकलन योजना से जुड़े प्रायः सभी इतिहासकारों— प्रो. शिवाजी सिंह, प्रो. सतीश चन्द्र मित्तल, डॉ. शरद हेबाळकर, आदि के अतिरिक्त योजना के संगठन-सचिव श्री हरिभाऊ वझे तथा स्वयं श्री दत्तात्रेय होसबले भी उपस्थित थे। दो दिन चली बैठक में सभी यह चर्चा कर रहे थे कि ‘‘(वेदों को अपौरुषेय मानकर, पुराणों को ‘इतिहास’ मानकर और रामायण तथा महाभारत की भारतीय तिथि ही मानकर) हमें भारत का 5 हज़ार वर्ष का इतिहास सुनिश्चित करना है।’’ यह भयानक विरोधाभास देखकर मैं मन-ही-मन कुढ़ रहा था। दूसरे दिन मुक्त-सत्र में मुझे भी बोलने का अवसर मिला। मैंने उस अवसर का लाभ उठाकर उपर्युक्त मानसिकता पर एक तीखा भाषण दिया कि ‘क्या हम केवल 5 हजार वर्षों का इतिहास निश्चित करने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं? यदि यही मानकर चलना है कि भारतवर्ष का इतिहास केवल पाँच हज़ार वर्षों का है, तो यूरोपीयों द्वारा लिखा इतिहास कौन-सा बुरा है?’’

रवि शंकर जी ने अपने लेख में बिलकुल ठीक इंगित किया है कि सिंधु-सभ्यता का पता लगे तो कई दशक व्यतीत हो चुके हैं, उससे पूर्व मैक्समूलर ने वेदों का समय 1200 ई.पू. निश्चित किया था, सभ्यता का पता लगने पर उसे आर्यों द्वारा विनष्ट मानकर वेदों का काल 1500 ई.पू. माना गया, जबकि उस समय कई भारतीय और यूरोपीय विद्वान् वेदों को इतना अर्वाचीन मानने के पक्ष में नहीं थे। पर चूंकि अंग्रेज़ उस समय शासक थे, इसलिए उन्होंने इस सिद्धान्त को पुस्तकों में डालकर कई पीढि़यों को रटवाया। इस प्रकार यह महाझूठ, इतिहास में दर्ज हो गया। उसके पीछे जेम्स उशर की ‘बिबलिकल क्रोनोलॉजी’ उत्तरदायी है, जिधर से प्रो. सूर्यकान्त बाली-जैसे भारतीय राष्ट्रवादी और वामपंथी विद्वान् आँखें मूँदे हुए हैं— इस बात को रवि जी ने स्पष्ट किया है।

रवि शंकर जी ने निर्भीकता से इस बात को उठाया है कि हड़प्पा-सभ्यता का उत्खनन हुए अनेक दशक बीतने और अनेक नये अनुसन्धान होने पर भी भारत का इतिहास पाँच-सात हज़ार वर्ष पीछे नहीं जा पा रहा है। इसके पीछे यूरोप-केन्द्रित मानसिकता, वापमंथी इतिहाकारों के खेमे में पैठ बनाने की होड़ तथा भारतीय वाङ्मय के अध्ययन के अभाव, आदि मुख्य कारण हैं। भारत का इतिहास लाखों-करोड़ों वर्ष पुराना हो सकता है— यह बात सूर्यकान्त बाली-जैसे लेखकों की बुद्धि से परे है।

रवि शंकर जी ने अपने लेख में भारत को समझने की पाँच शर्तें बतलाई हैं।

पहली शर्त बताई है भारतीय वाङ्मय के आधार को समझना और उसपर विश्वास करना। मैंने अपने अध्ययन-काल में यह पाया है कि राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रायः सभी इतिहासकार, विद्वान् ‘भारतीय कालानुक्रम’ (इण्डियन क्रोनोलॉज़ी) से नितान्त अनभिज्ञ हैं। उन्हें पुराणों, स्मृतियों, महाभारत और सूर्यसिद्धान्त में प्रतिपादित ‘मन्वन्तर-कालगणना’ का अभ्यास नहीं है, न ही वे इस पचड़े में पड़ते हैं। वे ‘कल्प’, ‘मन्वन्तर’, ‘चतुर्युग’, आदि को प्रायः गल्प मानकर चलते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि करोड़ों-अरबों वर्ष की गणना को कोई भी समझदार व्यक्ति नहीं मानेगा। इसलिए वे मध्यम मार्ग अपनाते हुए तिथियों का एक गड़बड़झाला प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार, सैद्धान्तिक रूप से वे वेदों को अपौरुषेय तो मानते हैं, लेकिन घटनाओं का काल-निर्धारण करते समय वे पुरातत्त्व और सॉफ्टवेयर-गणना को प्रमाण मानकर वेदों को पाँच या सात हज़ार ई.पू. रचित मानने में गौरवान्वित होते हैं। पौराणिक घटनाओं की वे अपने हिसाब से व्याख्या करते हैं। महाभारत को वे अवश्य पाँच हज़ार वर्ष पुराना मानते हैं, लेकिन उसके साथ बाकी सारी घटनाएँ कैसे समांग बैठेंगी, इसकी वे चिन्ता नहीं करते। सूर्यकान्त बाली भी इसमें अपवाद नहीं हैं।

दूसरी शर्त है आधुनिक विज्ञान (कार्बन डेटिंग, विकासवाद, सॉफ्टवेयर-गणना, इत्यादि) के चश्मे से भारतीय परम्पराओं को देखने-समझने का प्रयास बन्द करना। इंग्लैण्ड के नृवैज्ञानिक और अन्वेषक चार्ल्स डार्विन ने अपनी दो पुस्तकों में ‘विकासवाद’ की जो अवधारणा दी, उसने समकालीन इतिहासकारों की मानसिकता को पूरी तरह झकझोरकर रख दिया। ‘सृष्टि और सभ्यता का निरन्तर विकास हो रहा है’ और ‘मानव का विकास बन्दर से हुआ है’-जैसे सिद्धान्तों ने अनेक नये काल्पनिक सिद्धान्त गढ़े और उनके आधार पर यूरोपीय विद्वानों ने इतिहास की पुनर्व्याख्या की। इस व्याख्या का परिणाम यह हुआ कि भारतीय अतीत के ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता, संस्कृति, धर्म, सदाचार, आचार-विचार, बुद्धि-विवेक, शौर्य-पराक्रम, त्याग-तपस्या, वैभव-ऐश्वर्य— सभी पर पानी फिर गया। वेदोपनिषद् आर्यों की आदिम मानसिकता के ग्रंथ मान लिए गए और पुराण काल्पनिक। आज भी भारत का इतिहास इस सिद्धान्त से शतशः प्रभावित है। इतिहास में ‘पाषाण-युग’, ‘नवपाषाण-युग’, ‘लौह-युग’, ‘कांस्य-युग’, ‘ताम्र-युग’-जैसे सिद्धान्त इसी की देन हैं। जबकि भारतीय परम्परा सभ्यता को रेखीय न मानकर चक्राकार मानती है, जिसमें विकास और ह्रास का क्रम चलता रहता है। सत्ययुग के बाद त्रेता, फिर द्वापर, फिर कलियुग, उसके बाद पुनः सत्ययुग की अवधारणा ही भारतीय अवधारणा है। आज यूरोप के शिक्षाकेन्द्रों में विकासवाद की अवधारणा की पढ़ाई बन्द हो चुकी है, लेकिन भारतीय स्कूलों में इसे बदस्तूर जारी रखा गया है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। इसी प्रकार सॉफ्टवेयर के आधार पर वेद, रामायण और महाभारत की डेटिंग भी कितनी विध्वंसक है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। सॉफ्टवेयर-आधारित गणना से सत्ययुग का आरम्भ 12101 ई.पू. में, त्रेतायुग का आरम्भ 8101 ई.पू. में, द्वापरयुग का आरम्भ 5101 ई.पू. में (श्रीराम 13 वर्ष के थे जब द्वापर का आरम्भ हुआ) और कलियुगारम्भ 3101 ई.पू. में हुआ। जिस कारण 2101 ई.पू. में कलियुग का अन्त और वर्तमान चतुर्युग का आरम्भ हुआ। इस हिसाब से 2101 ई.पू. से 1899 ई. तक सत्ययुग था और अभी द्वापर चल रहा है....। सॉफ्टवेयर के आधार पर गणना करनेवालों को यह तक नहीं पता कि भारतवर्ष के सभी पंचांग हज़ारों-लाखों वर्षों से जिन ग्रंथों के आधार पर बनते आए हैं, उन सभी में 43,20,000 वर्षों का एक चतुर्युग मानकर गणना करने की परम्परा है जिसमें 1728000 वर्षों का एक सत्ययुग, 1296000 वर्षों का त्रेता, 864000 वर्षों का द्वापर और 432000 वर्षों का कलियुग माना गया है। यह गणना लगभग सभी पुराणों, महाभारत, सूर्यसिद्धान्तादि ज्योतिष-ग्रंथों और मनुस्मृति आदि में एक समान दी हुई है। इन्हें झुठलाकर केवल 12,000 वर्षों का चतुर्युग मानकर इन लोगों ने भारतीय इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा है और इतिहास का अत्यधिक संकुचन किया है। रवि शंकर जी ने अपने लेख में सूर्यकान्त बाली-जैसे तथाकथित विद्वानों द्वारा छद्म वैज्ञानिकता के नाम पर इतिहास में की जा रही तोड़-फोड़ की तीखी आलोचना की है।

रवि शंकर जी ने भारत को समझने की तीसरी शर्त बतलाई है : ‘यूरोपीय या औपनिवेशिक शब्दावली से भारतीय परम्परा को समझने की मानसिकता से बाहर आना’। ‘सेक्युलर’ का अर्थ ‘धर्मनिरपेक्ष’, ‘साइंस’ का अर्थ ‘विज्ञान’, ‘रिलीजन’ का अर्थ ‘धर्म’, ‘हिस्ट्री’ का अर्थ ‘इतिहास’ और ‘नेशन’ का अर्थ ‘राष्ट्र’ मानने से समाज में बड़े-बड़े भ्रम निर्मित हो गए हैं। इसी प्रकार ‘दलित’, ‘आदिवासी’, ‘मूल निवासी’-जैसी शब्दावलियाँ भी औपनिवेशिक शासन की देन हैं, जिन्हें राजनीतिक लाभ के लिए प्रयोग किया जा रहा है। कई वर्ष पूर्व लखनऊ से प्रकाशित ‘राष्ट्रधर्म’ में श्री हृदयनारायण दीक्षित ने अपने एक लेख में महीदास, हनुमान, जाम्बवन्त, आदि को ‘अब्राह्मण’ बतलाया था। वैदिक संस्कृति किसी को जन्म से ब्राह्मण या शूद्र नहीं मानती, बल्कि उस काल में कर्म के आधार पर वर्ण का निर्धारण होता था। ऐसे अनेक उदाहरण उस काल के ग्रंथों में मिलते हैं। इन उदाहरणों से आँखें मूँदकर अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए वर्णव्यवस्था और जाति-प्रथा को घालमेल करने की सूर्यकान्त बाली द्वारा कोशिश की रवि शंकर जी ने तीखी आलोचना की है।

भारत को समझने की चौथी शर्त बतलाई है : ‘यूरोपीय विद्वानों को प्रमाण मानने में अत्यधिक सावधानी बरतना’। आज मानसिकता यह है कि यूरोप के लेखक ने जो बात कह दी, उसे ब्रह्मवाक्य मान लिया जाता है, भले ही वह बात गलत हो। लेकिन अपने भारतीय पूर्वज मूर्ख दिखाई पड़ते हैं। यूरोपीय लेखकों को प्रमाण मानने से इतिहास में अनेक गलत तथ्य रूढ़ हो गये। रवि शंकर जी ने मेगास्थनीज का उदाहरण दिया है। मेगास्थनीज की मूल पुस्तक ग्रीक लिपि में लिखी ‘इण्डिका’ तो मिलती नहीं, उसके कुछ उद्धरण यूनानी ग्रंथों में मिलते हैं। उन्हें एक जर्मन लेखक श्वानबेक ने संग्रहित कर ‘इण्डिका’ के ही नाम से जर्मन-भाषा में प्रकाशित किया। इसी प्रकार सिकन्दर के समकालीन यूनानी लेखकों के छद्म विवरणों को प्रमाण मान लिया गया और सिकन्दर के समकालीन ‘सेण्ड्रोकोट्टस’ को चन्द्रगुप्त मानकर सिकन्दर को विजेता तथा पुरु को विजित मान लिया गया। डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी-जैसे भारतीय इतिहासकार ने सिकन्दर के आक्रमण की तिथि को ‘भारतीय इतिहास का प्रस्थान-बिन्दु’ मान लिया। इस प्रकार भारतीय इतिहास में 1,300 वर्षों की भूल प्रविष्ट हो गई, जिसे स्थापित सत्य मान लिया गया है। आज जगद्गुरु आद्य शंकाराचार्य का समय 788-820 ई. माना जाता है जबकि शांकर-मठों में सभी पीठों के आचार्यों की नामावली सुरक्षित है (शृंगेरी मठ को छोड़कर), जिसके अनुसार आद्य शंकराचार्य का समय 509-477 ई.पू. निश्चित होता है। लेकिन यूरापीय कालानुक्रम से प्रभावित भारतीय इतिहासकारों ने इस सूची को जाली मान लिया है और आद्य शंकराचार्य का समय 8वीं शती रखा है। आद्य शंकराचार्य और भगवान् बुद्ध के मध्य 1,400 वर्ष का अन्तर था और बुद्ध पूर्ववर्ती थे। इस दृष्टि से बुद्ध का समय 1887-1807 ई.पू. आता है, लेकिन ज्ञात इतिहास में बुद्ध को छठी शताब्दी ई.पू. से पहले मानना पाप समझा जाता है। यदि सूर्यकान्त बाली-जैसे विद्वान्, पुराणों की वंशावलियाँ पढ़े होते, उनके आधार पर भारतीय इतिहास का कालानुक्रम तय किए होते, तो उन्हें पता चलता कि आज से 5,200 वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ, उससे लाखों वर्ष पूर्व श्रीराम का अवतार-काल है, उससे भी लाखों-लाख वर्ष पूर्व से पुराण अस्तित्व में हैं (संपादित होते आए हैं), उससे भी करोड़ों-करोड़ वर्ष पूर्व वेद किसी समय प्रकाशित हुए हैं; वह यह कभी न कहते कि वेदों को दस हज़ार वर्ष पूर्व से पीछे नहीं ले जाया जा सकता। रवि शंकर जी ने स्पष्ट बताया है कि विदेशी विवरणों को भारतीय इतिहास के लिए प्रमाण मानने से पहले उसका सावधानीपूर्वक विश्लेषण करना आवश्यक है, अन्यथा इतिहास में बड़ी भूल शामिल हो सकती है।

रवि जी ने भारत को समझने की पाँचवीं शर्त बतलाई है: ‘संस्कृत-भाषा का ज्ञान’। आज देश के अधिकांश इतिहासकार संस्कृत-भाषा के ज्ञान से अनभिज्ञ हैं और अंग्रेज़ी या हिंदी अनुवाद के आधार पर अपना काम चलाते हैं। पहले यूरोपीय विद्वानों ने बड़े परिश्रम से संस्कृत सीखी, फिर संस्कृत-ग्रंथों का अंग्रेज़ी, जर्मन या फ्रेंच-भाषा में अनुवाद किया, फिर उन अनुवादों के बल पर भारतीय इतिहासकारों ने अपने वैदिक-पौराणिक ग्रंथों की मनमानी व्याख्या की। इसके विपरीत संस्कृत-विद्वान् इतिहास से कोई मतलब ही नहीं रखते। भारतीय इतिहासकार अपने आधे-अधूरे ज्ञान के आधार पर विद्यार्थियों को शोध-कार्य करवाते हैं। यदि उन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया होता, तो वे कह सकते थे कि प्राचीन भारत में गोमांस नहीं खाया जाता था, किसी वैदिक ग्रंथ में ऐसा उल्लेख नहीं है; लेकिन संस्कृत का ज्ञान न हो पाने की वजह से वे ऐसा नहीं कह सके। फलतः जो यूरोपीय प्राच्यविदों— मोनियर विलिसम्स आदि या अंग्रेज़ों द्वारा खरीदे गए संस्कृत-विद्वानों— डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे, आदि ने लिख दिया, उसे ही सत्य मान लिया गया। आज लगभग सभी वैदिक और पौराणिक ग्रंथों के अनुवाद उपलब्ध हैं और उन्हीं के आधार पर शोध-कार्य किया जाता है। विश्वविद्यालय के छात्र और अनुसन्धानकर्ता उन अनुवादों का उपयोग करते हैं। वैदिक और लौकिक संस्कृत में निबद्ध मूल ग्रंथों का अध्ययन करने की कोई ज़हमत नहीं उठाता, क्योंकि उसके लिए संस्कृत सीखनी आवश्यक है। संस्कृत सीखने के श्रम से बचने के लिए मूल ग्रंथों के अनुवाद और टीकाओं से काम चलाया जाता है, जो या तो यूरोपीय विद्वानों ने तैयार किए हैं या भारतीय संस्कृतज्ञों ने, भले ही वे अनुवाद और टीकाएँ कितनी ही भ्रष्ट और दोषपूर्ण क्यों न हों। विश्वविद्यालय के आचार्य भी संस्कृत सीखकर शोध-कार्य करने के लिए उत्साहित नहीं करते, बल्कि वे शीघ्रातिशीघ्र डिग्री लेकर नौकरी प्राप्त करने को ही ‘परम बुद्धिमानी’ मानते हैं। शोध-ग्रंथों की ‘बिबलियोग्राफी’ (आधार ग्रंथ सूची) में संस्कृत-ग्रंथों की लम्बी-लम्बी नामावली लगा दी जाती है, लेकिन उनमें से मूल ग्रंथ शायद ही कोई शोधकर्ता देखते हों। रवि शंकर ने अत्यन्त सूत्र रूप में इन बातों को अपने लेख में उठाया है, जिसके लिए वे शतशः साधुवाद के पात्र हैं।

‘कहाँ है भारत के लाखों-करोड़ों वर्ष का इतिहास’ उपशीर्षक से रवि जी ने अपने लेख का उपसंहार किया है। उन्होंने ‘विज्ञान’ के पूर्व संपादक प्रो. रामदास गौड़ का विख्यात उद्धरण दिया है जो कल्याण के ‘हिंदू संस्कृति अंक’ से लिया गया है। यूरोपीय मानसिकता के भारतीय विद्वान्, जो सृष्टि की उत्पत्ति 23 अक्टूबर, 4004 ई.पू. मानते आए हैं, कभी कल्पना ही नहीं कर सकते कि हमारी सभ्यता करोड़ों-अरबों वर्ष पुरानी है। वे तो पुराणों को गप्प और ब्राह्मणों का षड्यन्त्र मानते हैं। उनके लिए तो पुराण कल्पनाएँ हैं। जबकि भारत का एक सुनिश्चित, सुसम्बद्ध इतिहास है और सभी संस्कृत-ग्रंथ विरोधाभास से रहित होकर उसका दिग्दर्शन कराते हैं। भारतीय परम्परा यह कहती है कि ‘‘जो हमारी कालगणना है, वही हमारा इतिहास है; और जो हमारा इतिहास है, वही हमारी कालगणना है।’’ हमारी कालगणना और हमारा इतिहास एक है। हमारा इतिहास विगत पाँच या दस या बीस हज़ार वर्षों से एकाएक कहीं से प्रारम्भ नहीं हो गया, बल्कि वह कालचक्र के प्रवर्तन के साथ प्रारम्भ हुआ है। भगवान् विष्णु के नाभिकमल पर उत्पन्न ब्रह्माजी ने जिस दिन प्रथम बार सृष्टि की सर्जना शुरू की, अर्थात् ब्रह्मा के प्रथम परार्ध के प्रथम कल्प के प्रथम मन्वन्तर के प्रथम चतुर्युग के सत्ययुग के प्रथम मास की प्रथम तिथि, यानि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भारतीय-इतिहास का प्रस्थान-बिन्दु है। अर्थात् 15 नील, 55 खरब, 13 अरब, 33 करोड़, 29 लाख, 49 हज़ार 119 वर्ष का भारतवर्ष का इतिहास है। इतने वर्षों से हमारा धर्म चला आ रहा है। इसलिए इसे सनातन-धर्म कहा जाता है, भारतवर्ष को सनातन हिंदू-राष्ट्र कहा जाता है और वैदिक ग्रन्थों को अनादि-अपौरुषेय कहा जाता है। श्रीअरविन्द (1872-1950) ने सनातन-धर्म को ही राष्ट्रीयत्व कहा है। और इसलिए सनातन-धर्म में आजतक कोई ‘पैग़ंबर’ नहीं हुआ, जैसा कि विभिन्न सम्प्रदायों में हुए। और इसलिए सनातन धर्म का कोई ‘एक धर्मग्रन्थ’ नहीं है, जैसा कि विभिन्न सम्प्रदायों में हैं। और इसलिए हिंदू-समाज किसी ‘एक निश्चित उपासना-पद्धति’ से भी बँधा हुआ नहीं है, जैसा कि विभिन्न सम्प्रदाय बँधे हुए हैं, अस्तु! जिस समय हमने, यानि संसार के प्रथम मनुष्य, यानि स्वायम्भुव मनु ने संसार में पहली बार कदम रखा, उसी समय से (‘संकल्प-पाठ’ के द्वारा) हम समय की गणना करते आ रहे हैं। इसलिए हमारी गणना में एक सैकंड की भी गड़बड़ी नहीं है। सृष्टि के प्रथम दिन से लेकर आजतक एक-एक दिन का हिसाब हमने रखा है। इतने वर्षों का इतिहास अपने पुराणों में सुरक्षित है और वह भी कालगणना के साथ। पुराणों में ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण सदैव कालक्रम के चौखटे में ही दिया गया है। कहीं भी कालक्रम की उपेक्षा नहीं की गई है। आर्ष-ग्रन्थों में घटनाक्रम की कालबद्ध चर्चा परार्ध, कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर, नक्षत्र इत्यादि में की गई है। सम्पूर्ण पुराणों, उपपुराणों, रामायण, महाभारतादि ग्रन्थों में कालगणना के इन्हीं मापदण्डों को अपनाया गया है। इनके सहारे सृष्ट्यिुत्पत्ति से लेकर वर्तमान समय तक के भारतीय-इतिहास की समयावली (क्रोनोलॉज़ी) प्राप्त हो जाती है। किन्तु दुर्भाग्य से हिंदुओं की इस महान् विशेषता (‘संकल्प-पाठ’) को केवल कर्मकाण्ड तक सीमित मानकर उसपर कोई विशेष अनुसन्धान की आवश्यकता नहीं समझी गई है।

रवि शंकर जी ने अपने लेख में भारतीय वैज्ञानिक चिन्तन में अनादित्व के सिद्धान्त को विस्तार से बताया है। भारतीय पुराण और दर्शनग्रंथ सृष्टि, स्थिति और प्रलय के सिद्धान्त को स्थायी नहीं मानते और उसे चक्रीय मानते हैं। हमारे यहाँ 18 हज़ार बार सृष्टि, उतनी ही बार स्थिति और उतनी ही बार प्रलय हो चुकी है; हमारे यहाँ लोमश मुनि भी हो चुके हैं, जिनके शरीर के एक-एक रोम में एक-एक कल्प की आयु है। फिर भी हमारे यहाँ शरीर के अमरत्व की तलाश नहीं है, बल्कि यहाँ आत्मा की अमरता का अनुभवसिद्ध ज्ञान है। हमने इतिहास में काल की अवधारणा को आत्मसात करते हुए भी और कालगणना का प्रचलन करने के बाद भी ‘अमुक घटना कितने वर्ष पूर्व घटी’ या ‘अमुक व्यक्ति कब पैदा हुआ’ या ‘अमुक ग्रंथ कब लिखा गया’— इस बात को सिद्ध करने की कभी चिन्ता नहीं की। यह तो यूरोपीय विद्वानों की चर्चा का विषय है और उन्होंने ही दुनिया की सारी सभ्यताओं के अवशेषों को खोद-खोदकर उनकी कालगणना की है। उनके लिए यह जानना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि अमुक संस्कृत ग्रंथ कब लिखा गया, अमुक ऋषि कब पैदा हुआ या दाशराज्ञ-युद्ध की घटना कब घटित हुई। परन्तु हमारे ऋषियों ने इस जड़ इतिहास को सम्भालने की कभी चिन्ता नहीं की। प्रख्यात इतिहासकार डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने अपने सुप्रसिद्ध निबन्ध ‘इतिहास दर्शन’ में प्राच्य और पाश्चात्य इतिहास-दृष्टि पर विस्तार से लिखा है, जो अवश्य पढ़ना चाहिये। उसमें उन्होंने लिखा है, ‘‘वेद भूतकाल के लिए थे, किसी युग-विशेष के मस्तिष्क की उपज थे और उसी समय के समाज के लिये उनका उपयोग होता था’ इत्यादि बातें पाश्चात्य और उनके पदानुगामी भारतीय विद्वानों के मस्तिष्कों में सबसे पहले आती हैं। भारतवर्ष का जो स्वदेशी जीवन है, उसके रोम-रोम में वेद अब भी विद्यमान है। हमारे समस्त संस्कार, नित्यकर्म अब भी उन्हीं वेद-मंत्रों से होते हैं, जिन्हें पूर्वे पूर्वजनाः, पूर्वे ऋषयः अब से पाँच या दस या बीस हज़ार वर्ष वर्ष पूर्व गाते थे। कुछ विद्वान् वेदों को बीस या तीस हज़ार वर्ष पुराना कहकर बड़े प्रसन्न होते हैं। परन्तु यह भाव भी भारतवर्ष के परम्परागत विचार के विरुद्ध है। वेदों को पाँच हज़ार वर्ष पुराना कहें या बीस हज़ार वर्ष, उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। इन दोनों का ही आर्य-अनुश्रुति से विरोध है। हिंदू-भाव तो वेदों को सनातन मानता है।’’

रवि शंकर जी ने यूरोपीय इतिहासकार के हवाले से बताया है कि ‘‘इतिहास कभी शुद्ध रूप में प्राप्त नहीं हो सकता, वह हमेशा लेखक के मस्तिष्क में रँगकर आता है। इतिहासकार अपने मत-मुताबिक घटना की व्याख्या करता है।’’ इसका मतलब यह हुआ कि इतिहास कभी भी पूर्णतया निरपेक्ष और वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकता। ऐसे में भारतीय मनीषियों द्वारा लिखे पौराणिक इतिहास को नकारना कहाँ तक उचित है? भारत का पौराणिक इतिहास संवाददाताओं के तार, टेलिप्रिंटर या समाचार-पत्रों के आधार पर या अटकलों के आधार पर नहीं बना; और न किसी मूर्ति, शिलालेख, स्तम्भों अथवा मुद्राओं के आधार पर ही बना है। रामायण, महाभारतादि आर्ष इतिहास के लेखक वाल्मीकि, व्यास आदि ऋषिजन समाधिजन्य ऋतम्भरा-प्रज्ञा के अनुसार घटनाओं को पूर्णतया जानकर ही इतिहास लिखने में संलग्न हुए थे। उन्होंने जो भी दिव्य-दृष्टि से देखा, वही लिखा। योग से ऐसा होना असम्भव नहीं; इसलिये अधूरी, भ्रान्तिपूर्ण खोजों के आधार पर पुराणों के किसी नियम को ग़लत नहीं ठहराया जा सकता, और वह भी ऐसी स्थिति में जब उनके वर्णन क्रमशः सत्य सिद्ध होते जा रहे हैं। रविजी ने बिलकुल ठीक इंगित किया है कि धार्मिक अनुष्ठानों, विवाहों, अश्वमेध-राजसूय-वाजपेय यज्ञों में भी इतिहास का वाचन अनिवार्य था। राजवंशों का इतिहास लिखने के लिये प्रत्येक हिंदू राजा के दरबार में विद्वान् नियुक्त होते थे। तीर्थयात्राओं में परिवारों के पण्डे उनकी वंशावलियाँ लिखते थे। गया, जगन्नाथपुरी, बद्रीनाथ इत्यादि स्थानों में यह परम्परा आज भी भी देखी जा सकती है।

यहाँ डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का कथन प्रासंगिक जान पड़ता है: ‘‘आज जो यूरोप सोचता है, उसी की छाया भारतीय विद्वान् सर्वत्र ढूँढ़ते हैं। यूरोप के ही ढले हुए शब्दों, यथा— ‘कम्युनिज़्म’, ‘सोशलिज़्म’, ‘डिमॉक्रेसी’, ‘नेशनलिज़्म’ आदि में सब सभ्यताओं के इतिहास को घसीट लाने की कोशिश करते हैं। अपना दर्शन जबतक पश्चिमी परिभाषा में न कहा जाए, तबतक वह युक्तिसंगत नहीं जान पड़ता। पश्चिम के शब्द पाकर मानो वह नये आलोक में खिल उठता है।’’

भारत के तथाकथित विद्वानों ने पश्चिम का अन्धानुकरण करते हुए भारतीय-इतिहास को प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक— इन तीन कल्पित काल-विभागों में बाँटकर, भारतीय गौरव को प्राचीन काल में ठूँस दिया है। और इस प्रकार ‘भारतवर्ष का इतिहास’ (हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया) अभी तक लिखा ही नहीं गया है। इस नाम से जो पुस्तकें प्रचलित हैं, वे पाश्चात्य विद्वानों के विचारों के नमूने हैं। ‘इतिहास’ शब्द का जो अर्थ वे लगाते हैं, उसी के अनुसार यहाँ का इतिहास उन्होंने लिखा है, अस्तु!

रवि शंकर जी ने अपने गुरु-गम्भीर निबन्ध में भारत, भारतीय संस्कृति, भारतीय सभ्यता, भारतीय महनीयता, भारतीय इतिहास और भारतीय मानस को जानने-समझने की एक अनूठी दृष्टि प्रदान की है, जिसके लिए विद्वज्जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। रवि जी के कई निबन्धों में यह विशेष प्रकार का निबन्ध है। यह निबन्ध भारतीय इतिहासकारों का नेत्रोन्मीलन करने में समर्थ है। आवश्यकता है पूर्वाग्रहरहित होकर इस पर चिन्तन-मनन और अमल करने की। मेरा मानना है कि किसी भी राष्ट्र को उसी की अपनी परम्पराओं और उसी देश से उपलब्ध अभिलेखों को सन्देह की दृष्टि से देखते हुए, कभी भी ठीक से समझा नहीं जा सकता। रवि शंकर जी ने अनेक उदाहरणों से इस कथन को पुष्ट किया है। इस विषय पर और भी चर्चा की आवश्यकता है। लेखक को अशेष साधुवाद।

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