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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



हिन्दी खड़ी बोली के सर्वाधिक देदिव्यमान प्रकाशयुक्त स्तम्भ :
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी


डॉ छेदी साह


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी खड़ी बोली के देदीव्यमान् प्रकाश-स्तम्भ माने जा सकते है| युग-स्त्रष्टा भारतेंदु का युग “ हिन्दी गघ का रचनात्मक काल था , प्रयोग काल था| ऐसे समय में भाषा के स्थिरीकरण के लिए आवश्यक भी नहीं था| भारतेंदु पहले भाव ठीक करने के पक्ष में थे, भाषा नहीं |”अत: व्याकरण की शुद्धता का सर्वथा अभाव भारतेंदु की विविध शैलियों में है | द्विवेदी-काल को भाषा तथा शब्द –शैली के संस्कार का काल मान गया हैं | भारतेंदु ने जिस खड़ी बोली को प्रयोग के वैज्ञानिक विधान की तरह युग को शौंपा उसे परिष्कृत और विकास के सोपान पर प्रोढ़ता प्रदान की द्विवेदी-युग ने | व्याकरण के सूत्रों की श्रृंखला, शब्द-संस्कार के महत्व तथा पुष्ट भावों के संग्रहन के लिए प्रौढ़ भाषा के उत्तर दायित्व की ओर हिन्दी-प्रेमियों का ध्यान द़वेदी-युग ने आकृष्ट किया “भाषा को व्यवस्था देने का गुरुतर उत्तरदायित्व “द्विवेदी जी के कन्धो पर पड़ा और एक कुशल नेता की तरह उन्होंने व्यवस्था को सफलता से गौरवान्वित भी किया |

अगर भारतेंदु हिन्दी कविता में राष्ट्रीय जागरण के वैतालिक हैं , भाव समन्वय के महान कलाकार हैं तो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी नई हिन्दी के प्रथम समालोचक और युग प्रवर्त्तक आचार्य माने जा सकते है| इनकी प्रखर प्रतिभा की ऐसी अमिट छाप युग चेतना पर पड़ी कि इस काल को विद्ववान समालोचकों ने द्विवेदी युग की संज्ञा दी |

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का अविर्भाव एक लब्ध-प्रतिष्ट ब्राह्मण कुल में वैशाख शुक्ल ४ संवत १९२१ में हुआ था | इनके पिता पण्डित राम सहाय द्विवेदी राय बरेली जिला के दौलतपुर ग्राम के निवासी थे तथा सिपाही-विद्रोह में सक्रिय हिस्सा लेने के कारण अंग्रेजों के कोप-भाजन बने थे | बैष्णव होने के नाते राम और महावीर के अनन्य भक्त भी थे और यही कारण है कि यशस्वी शिशु महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम ‘महावीर ‘ पड़ा | कर्मठता, लग्नशीलता और अध्यवसाय द्विवेदी जी के स्व्भावसिद्ध गुण थे | बचपन में संस्कृत की शिक्षा उन्हें मिली और स्कूल में अंग्रेजी की तालीम पर आर्थिक कठिनाईयों और पारिवारिक विश्रृंखलता के चलते इन्हें स्कूल की पढ़ाई की समाप्ति के बाद उच्च शिक्षा का शौभाग्य नहीं प्राप्त हो सका और रोजी रोटी के लिए जीवन का संघर्ष पथ पर उतर बढ़े | रेलवे में ‘तार’ का कम सीखकर ये ‘तारबाबू ‘ बन गये | अपूर्व लगन, अटूट धैर्य , कर्मठ कार्य-दक्षता एवं रूचि-संलग्नता के कारण इनकी पदोन्नति भी हुई पर स्वाभिमान और चारित्रिक गौरव के चलते इन्हें अधिकारियों से संघर्ष भी होता गया |अधिकारी चाहते थे जी –हुजूरी और स्वाभिमान के पुतले द़वेदी जी के लिए यह घातक अपमान था | अंत में इन्होने त्याग-पत्र दे दिया तथा हिन्दी की सेवा की ओर उन्मुख हुए | हिन्दी के लिए निश्चित रूप से वह दिन गौरव और सौभाग्य का दिन था जब प्रमंडलीय-ट्राफिक-अधीक्षक से झगड़ा करके द्विवेदी जी ने सेवा-कार्य से त्याग-पत्र दे दिया | प्रतिभा के प्रसार और उपयोग के लिए वह अनुकूल वातावरण भी नहीं था |

साहित्य क्षेत्र में द़वेदी जी का पर्दापण कोई अप्रत्याशित घटना नहीं अपितु “ हिन्दी के लिए वरदान स्वरुप स्मरणीय एतेहासिक “ तथ्य है | भावों के उन्मुक्त आवेग में साहित्यकार यह भूल बैठे थे की साहित्य की सफल उपासना भाव और भाषा के सामंजस्य के आधार पर ही हो सकती है |गद्द-साहित्य की परम्परा को जिसे भारतेंदु ने अस्तित्व और चेतना का वरदान दिया था,परिमार्जित एवं परिवर्धित करने का श्रेय द़वेदी जी को ही है | भारतेंदु ने भाव के सौरभ से उसे सुरभित किया था | द्विवेदी जी ने उसे सौन्दर्य और श्रृंखला प्रदान की | भाषा के क्षेत्र में युग-प्रवर्तक,चिंतन के क्षेत्र में मौलिक,उदभावना में सहज प्रेमी तथा रचना के क्षेत्र में निष्पक्ष समालोचक बनकर ये आए |भारतेंदु का निधन लगभग ३५ वर्ष की आयु में हो गया था |पर सौभाग्य की बात यह थी कि भारतेंदु के बाद गद्द-साहित्य के विकास का दायित्व एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ा जो समर्थ तो था ही साथ ही जो इसके लिए पैदा ही हुआ था | उनकी जीवन-पर्यन्त साधना ने हमें गद्द-साहित्य का वह उत्कर्ष दिया जिसे पाकर हिन्दी-साहित्य कृतार्थ हो उठा | वह व्यक्ति थे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी | उन्होंने गद्द की अनेक शैलियों का प्रवर्तन और भाषा का व्याकरण-संभव परिष्कार किया | व्यवहार से एक कर्मठ पुरुष,साधना से संघर्षी और चिंतन से एक विवेकशील मनीषी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी खड़ी बोली की गद्द-शैली की एक प्रमुख शक्ति थे | भारतेंदु-युगीन प्रयोग को इन्होने परिशोधन के पथ पर उत्साह वर्द्धक उत्थान किया | व्याकरण के सूत्र आए तथा शब्द-संस्कार के महत्व तथा पुष्ट भावों को ठोस करने के लिए प्रौढ़ भाषा के उत्तरदायित्व की और आचार्य द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य सेवियों का ध्यान आकर्षित किया | भाषा को व्यवस्था देना एक गुरुत्तर दायित्व है जिसका सफलता पूर्वक निर्वाह द्विवेदी जी ने किया गद्य-साहित्य के निर्माण कार्य में द्विवेदी जी ने कवियों जैसी उद्दाम और स्वच्छंद कल्पना का सहारा न लेकर अपेक्षित् संगत साधना का पथ पकड़ा। ’सरस्वती’ के संपादन द्वारा उन्होंने शुद्ध गद्य-षैली के विकास और प्रसार पर काफी ध्यान दिया, हिन्दी-गद्य में स्थिरता और मूल्य निर्धारण की कसौटी प्रस्तुत की। इनकी भाषा बड़ी विषद, प्रांजल एवं बोध-गम्य है। इनमें सरसता के साथ-साथ वचन-विदग्धन्ना भी यत्र-तत्र पाई जाती है। शैली बड़ी रमणीय और प्रभावपूर्ण है। परिमार्जित, परिस्कृत, शुद्ध एवं प्रभावोत्पादक भाषा शैली के समर्थ साधक थे द्विवेदी जी। एक आलोचक ने भाषा के क्रांति-क्षेत्र में द्विवेदी जी को ’द्रष्टा’ और ’अधिनायक’ मानते हुए कहा है, उन्नीसवीं शताब्दी के साहित्यिक नेता भारतेन्दु हरिशचंद्र की चेतना नव जागरण से अभिभूत अवश्य थी परंतु (पुरातन) संस्कार परम्परा में पले व्यक्ति से सम्पूर्ण काया-कल्प की आषा नहीं की जा सकती थी। अंतरंग में नवीनता लाकर उनके युग ने कविता को जीवन की कविता तो बना दिया परंतु उसका माध्यम ब्रज-वाणी ही बनी रही। चिर प्रतिष्ठित ब्रजरानी को सिंहासन से उतार कर राष्ट्र की लोक-भाषा को ही कविता की भाषा बना देना महामहनीय अनुष्ठान है। इस अनुष्ठान का परम पुण्य और श्रेय प्रस्तुत साहित्य युग के अधिनायक सूत्र-धार महाप्राण महावीर प्रसाद द्विवेदी को है। भारतेन्दु और द्विवेदी ये दो व्यक्तित्व हिन्दी के शंकर और भगीरथ हैं। जिस क्रांति की गंगा में हम अवगाहन कर रहे है उसका अवतरण तो शंकर के मस्तक पर (कैलाष में नहीं काषी में) हुआ परन्तु अवतरण होने के उपरान्त उसे दिशा दिखाने वाले भगीरथ ही थे। गंगा उनकी ही पदानुसारिणी होकर भागीरथी हुई।’’भारतेन्दु की तरह द्विवेदी जी ने भी साहित्य-सेवियों की मण्डली तैयार की जिनमें प्रमुख गद्यकार थे पं० माधव प्रसाद मिश्र, सरदार पूर्णा सिंह और पं० चंद्रधर शर्मा गुलेरी। संस्कृत के प्रति अत्यधिक मोह के चलते पं० माधव प्रसाद मिश्र की गद्य-शैली संस्कृत से पूर्णतः प्रभावित समास-बहुल है। शैली पर विद्वता का बोझ है, गाम्भीर्य का आच्छादन है और है एक ज्ञान-संकुल बड़प्पन या उच्चता का बोध। श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी भी विद्वान थे पर उनकी गद्य-शैली में विद्वता का बोध सहज, रसिकता के साथ उद्बुद्ध है। उनके गद्य में विवेचन के साथ-साथ सजीवता भी मिलती है। इनके निबंध चिंतन और बुद्धि से गम्भीर है, अन्वेषणात्मक तत्वों से पूर्ण हैं, फिर भी पढ़ने पर पाठकों के ऊपर बोझ नहीं पड़ता। संस्कृत के कुशल विद्वान होते हुए भी इनके गद्य में चलती-फिरती और सहज प्रवाह पूर्ण भाषा के दर्शन होते हैं। भावुकता पूर्ण भाषा के समर्थ गद्यकार के रूप में सरदार पूर्ण सिंह की भाषा में नए ढ़ंग की लक्षणा और व्यंजना का चमत्कार है। इन सभी से अधिक समर्थ गद्यकार थे श्री पद्म सिंह शर्मा। इनका ज्ञान विस्तृत और असाधारण था तथा संस्कृत, फारसी, उर्दू, हिन्दी के ये कुशल ज्ञाता थे। इनके गद्य में उदाहरणों का बाहुल्य है, फड़कता हुआ हास्य है, चुभता हुआ व्यंग्य है। इनकी भाषा में ओज प्रवाह, भाव-विद्ग्धता और पर्याप्त संवेदनशीलता है। द्विवेदी जी ने विषिष्ट रूप से शैली के तीन प्रकारों को अपनाया था - वर्णात्मक - इसमें सहज सहदयता और सरल, अकृत्रिमता में आत्मीयता का दर्षन होता है और इसे पढ़ने-समझने के हेतु बुद्धि को अनावश्यक रूप से प्रयास नहीं करना पड़ता। इस शैली में उर्दू, फारसी, अंगे्रजी आदि के शब्दों को उदारतापूर्वक ग्रहण किया गया है, विचारात्मक और आलोचनात्मक- इसमें एक श्रृंखला है, एक तारतम्य, एक व्यवस्था, एक गाम्भीर्य है। उर्दू के शब्दों का प्रयोग इसमें भी है पर अत्यंत अल्प मात्रा में, इसकी भाषा विशुद्ध हिन्दी की ओर झुक जाती है और उससे वाक्यों की गठन-योजना में पर्याप्त बल आ जाता है, ’’इस प्रकार की शैली के संबंध में स्वर्गीय नन्द दुलारे वाजपेयी का मत था - ’’द्विवेदी जी की शैली का व्यक्तित्व यही है कि हृस्व अलंकृत और सूक्ष्म है। इनकी भाषा में कोई संगीत नहीं-केवल उच्चारण का ओज है जो भाषण कला से उधार लिया गया है।’’

व्यक्ति होकर संस्था के प्रतीक स्वरूप महावीर प्रसाद द्विवेदी का निधन 21 दिसम्बर 1938 ई० को हुआ। डाॅ० रामचन्द्र तिवारी ने इनके व्यक्तित्व की सराहना करते हुए कहा है ’’महावीर प्रसाद द्विवेदी के कृतित्व से अधिक महिमामय उनका व्यक्तित्व है। आस्तिकता, कर्त्तव्यपरायणता न्याय, निष्ठा, आत्मसंयम, परहितकातरता और लोक-संग्रह भारतीय नैतिकता के शाश्वत विधान हैं। आप इस नैतिकता के मूर्तिमान प्रतीक थे। आपके विचारों और कथनों के पीछे आपके व्यक्तित्व की गरिमा भी कार्य करती थी। वह युग ही नैतिक मूल्यों के आग्रह का था। साहित्य के क्षेत्र में सुधारवादी प्रवृत्तियों का प्रवेश नैतिक दृष्टिकोण कार्य कर रहा था। आपका कृतित्व श्लाध्य है तो आपका व्यक्तित्व पूज्य प्राचीनता को उपेक्षा न करते हुए भी अपने नवीनता का आश्रय दिया था। ’’भारत-भारती के प्रकाशन पर आपका अभिमत इस प्रकार था ’’ यह काव्य वर्तमान हिन्दी साहित्य में युगान्तर उत्पन्न करने वाला है’’ कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता लेस से प्रेरणा लेकर राष्ट्रकवि मैथिलीषरण गुप्त ने ’साकेत’ जैसे महाकाव्य की रचना की। कहना न होगा कि इस युगान्तर के मूल में आपका ही व्यक्तित्व कार्य कर रहा था। बड़ा से बड़ा साहित्यकार आपके प्रसाद की ही कामना करता है। सन् 1903 से सन् 1925 ई० तक आपने हिन्दी साहित्य का नेतृत्व किया। हिन्दी आलोचना को आपने ही व्यवस्थित किया। यों भारतेन्दु युग में, संयोगिता स्वयंवर आदि के गुण-दोषों की कुछ छानबीन हुई थी पर न तो वह आलोच्य के सत्य का क्रमबद्ध विवेचन विश्लेषण ही न उसकी कोई अप्रतिहत परम्परा ही बन सकी थी। द्विवेदी की ’नेषधचरित चर्चा’ ’विक्रमांकदेव चरित चर्चा, और कालिदास की निरंकुशता प्रभृति की प्रशंसा तक में समीक्षा की आभ्यन्तर प्रवृति निरूपण आदि भले ही स्पष्ट न हो सका हो किन्तु बाह्य (व्याकरण चर्चा गुण-दोष निरूपण आदि अवश्य विद्यमान है। उनके द्वारा आलोचना की निर्बाध परम्परा स्थापित हुई हैं।)

अतः निःसन्देह कहा जा सकता है कि विश्व साहित्य के निर्माताओं में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का स्थान सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि उन्होंने स्फीत भाषा को मानक स्वरूप तो प्रदान किया ही उसके साहित्यांगों की अपूर्व श्री वृद्धि की।

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