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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



दाख़िला


डॉ.सरस्वती माथुर


आज चकोरी को दसवीं कक्षा में प्रथम आने का पुरस्कार मिल रहा था। चाँदनी ख़ुश थी ।कल की सी बात लगती है उसको जब उसने अपने घर काम करने वाली बाई की बेटी से प्रश्न किया था-" मेरी तरह तू भी पढ़ाई किया कर ना चकोरी ?"

चाँदनी की बात सुन कर वह हंस पड़ी थी और बड़े बुज़ुर्गों के अंदाज में बोली थी --"तब बीबी जी खायेंगे क्या ,दस घरों में काम करके तो रोज़ी रोटी जुटाते हैं हम ।मैं पढ़ूँगी तो ख़र्चा कौन देगा?" चाँदनी के पिता वहीं बैठे थे ,दोनों की बातें सुन रहे थे। वे भले व समाज सेवी इंसान थे ।जाने क्या मन हुआ उनका ,उन्होनें तय कर लिया कि वह चकोरी का दाख़िला सरकारी स्कूल में करवा देंगें और उसकी पढ़ाई का सारा ख़र्चा उठायेंगे,अपना फ़ैसला जब उन्होनें घरवालों को सुनाया तो सभी ने इस नेक फ़ैसले का समर्थन किया ,धनिया तो सात जन्मों के लिये ऋणी हो गयी । चाँदनी को तो जैसे मन माँगी मुरादें मिल गयी थी ।उसने चकोरी को पढ़ने में सहयोग देना शुरू कर दिया ।एक तरह से उसकी टीचर ही बन गयी थी।उसके दिल की तरह उसका कमरा भी बड़ा था ।उसमें किताबों का अंबार लगा था ।चाँदनी के पास चकोरी के लिये भी एक कुर्सी लगवा दी गयी । हर शनिवार -इतवार को वह वहाँ आकर पढ़ती थी। समय के साथ साथ दोनों पढ़ाई के गहरे सागर में होते लगाने लगे और इस तरह चकोरी ने बड़े हौंसलें से जीवन में शिक्षा का पहला पड़ाव पार किया -दसवीं बोर्ड में प्रथम स्थान लाकर । चाँदनी भी टाॅप दस में चयनित थी । जब चकोरी पुरस्कार ले रही थी तो वह जोश में तालियाँ बजा रही थी ,इतनी भावुक हो गयी थी कि यह भी नहीं देख पायी थी कि पूरे हाल की तालियों की गूँज रूक गयी है और चकोरी कब की उसके पास आकर खड़ी होगयी हैं ।

डॉ.सरस्वती माथुर
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