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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



गीत -
अहं की दुकान


डॉ० अनिल चड्डा


 		 
अहं की दुकान खोले बैठा हूँ,
इंसानियत मैं फिर से खोने बैठा हूँ।

प्रेम में अहं कहाँ से आता है,
दिल से इसका नहीं कोई नाता है,
दिल का मैं मैल धोने बैठा हूँ।

प्रेम-आमन्त्रण को कभी चूकना नहीं,
तिरस्कार होने पे कभी थूकना नहीं,
प्रेम के मैं बीज बोने बैठा हूँ।

अपनी उपलब्धी पे क्योंकर नाज है,
कल नहीं होगा जो कुछ आज है, 
अपनी उपलब्धियों पे रोने बैठा हूँ।
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