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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



डॉ० रिक लिंडल द्वारा रचित अंग्रेजी पुस्तक 'The Purpose' का हिंदी अनुवाद
अध्याय 1
समस्यात्मक लड़का


लेखक: डॉ० रिक लिंडल
अनुवादक: डॉ० अनिल चड्डा


पहली पंक्ति में बैठे हुए विद्यार्थियों से प्रारम्भ करके, और उसके बाद पीछे बैठे हुए विद्यार्थियों से, विद्यार्थियों ने बारी बारी से दो पैराग्राफ पढने शुरू किये. कुछ बाकियों से अधिक निपुण थे, लेकिन ऐसा लग रहा थी कि वह सभी आसानी से पढ़ पा रहे थे. हरेक बार जब किसी बच्चे ने अपना भाग समाप्त किया, रिक्की जानता था कि उसकी बारी नजदीक आ रही थी, और डर बढ़ता गया. जल्दी ही रिक्की के सबसे अच्छे मित्र ह्यूगो की बारी थी. ह्यूगो रिक्की के सामने बैठा था और तीव्रता से पढ़ रहा था. अंत में अब रिक्की की बारी थी. उसका चेहरा लाल हो रहा था और उसे पसीना आ रहा था, यद्दपि उसे चार छोटी लाइन ही पढनी थी - उसके भद्दे हकलाने के कारण:

“जे-जे-जे-जे-जैक एंड जे-जे-जे-जे-जिल वेंट अप द हिल
टू एफ-एफ-एफ-एफ-फेच ए पी-पी-पी-पेल ऑफ़ वाटर.
जे-जे-जे-जे-जैक फेल्ल डाउन एंड बी-बी-बी-ब्रोक हिज क्राउन,
एंड जे-जे-जे-जे-जिल केम टी-टी-टी-टम्बलिंग आफ्टर.”

ऐसा लगता था जैसे इन शब्दों को बोलने के लिये उसे बहुत अधिक समय लग गया था, जबकि बीस विद्यार्थियों की कक्षा चुपचाप बैठी थी. इस कड़ी परीक्षा की पुनरावृति वर्ष में स्कूल के सारे दिनों में प्रतिदिन होती थी. 1960 का वर्ष था, और रिक्की आठ वर्ष का था. वह कोपवोगुर, जो राजधानी शहर रिकिविक, आइसलैंड, के नजदीक था, में रहता था. उसका पिता, बल्दुर, जो एक रासायनिक अभियंता था, उससे दूर ही रहता था और विचारों में तल्लीन और डूबा रहता था, अपनी वैज्ञानिक परियोजना, जिस पर वह काम कर रहा था, पर विचार करते-करते पाइप से धुआं उड़ाते हुए. उसकी माँ, अमालिया, दूसरी ओर, स्नेही और प्यार करने वाली थी. वह आइसलैंड में समकालीन जीवन पर अपने पत्रकार और लेखिका के पेशे के साथ पालन-पोषण का ज्यादातर भार संभालती थी. उसके माता-पिता अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट नहीं थे. कोई शराब का दुरुप्रयोग नहीं था या उनमें कोई उपद्रवी व्यवहार नहीं था; वह बस एक-दूसरे के साथ अपने सम्बन्ध से खुश नहीं थे. जब वह विद्यार्थी थे तो 1948 में मिले थे और किसी समय एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे. रिक्की के पिता एमआईटी में रासायनिक अभियांत्रिकी की पढाई कर रहे थे और उसकी माँ बोस्टन विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की विद्यार्थी थी.

रिक्की (नीचे बायें) 1961 में नौ वर्ष की उम्र में,
अपने माता-पिता और तीन भाइयों के साथ

उन्होंने एक साल में ही शादी कर ली और अमेरिका को छोड़ कर आइसलैंड में नया जीवन शुरू किया. अमेरिकन और आइसलैंडिक संस्कृति में सामंजस्य बिठाना, हालांकि, आसान नहीं था. 1960 तक अमालिया ने चार बच्चों को जन्म दे दिया था, और वह जल्दी ही फिर से गर्भवती होने वाली थी. परिवार को चलाने का तनाव उनके लिये स्पष्ट था जो उनको अच्छी तरह से जानते थे. अमालिया आइसलैंड में अपने साहसिक कार्यों के बारे में टिप्पणियां लिखती रहती थी; यह बाद में एक सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक में प्रकाशित हुई जो आज भी नए संस्करणों का आनन्द उठा रहे हैं.7

रिक्की को स्कूल में दिक्कतें हुईं. अपने हकलाने की वजह से वह शर्मिंदा और अपमानित महसूस करता था, और इस कारण से, जो उसके माता-पिता को पता नहीं था, वह अक्सर काफी दिनों तक गैर-हाजिर रहता था. उन दिनों, जबकि हाजरी कक्षा में ली जाती थी, स्कूल की यह नीति नहीं हुआ करती थी कि वह माता-पिता को बताएं जब तक कि बच्चा बिना कारण बताये स्कूल से कुछ दिनों के लिये गैर-हाजिर न रहे. निस्संदेह, स्कूल ने, हालांकि, रिक्की के माता-पिता को सूचना दी, जिस समय “बिल्ली बैग के बाहर थी”, जैसा कि कहते हैं, और रिक्की को दरी पर स्पष्टीकरण के लिये बुलाया गया. वार्तालाप अक्सर निम्नलिखित रूप में हुआ:

माँ: “मैंने तुम्हारा लंच पैक किया, और तुम स्कूल के लिये हर सुबह को निकले. उस समय तुम कहाँ गए थे?”

रिक्की: “मैं लम्बी सैर के लिये गया था, और कभी-कभी मैं उप-मंडल पर, जो स्कूल के रास्ते में बनाया जा रहा है, निर्माणकर्ताओं को भी कार्य करते हुए देखता था.”

माँ, उत्तेजित होते हुए: “क्यों, रिक्की? तुम ऐसा क्यों करते हो? मुझे डर है कि तुम वहां खुद को चोटिल कर लोगे. यह बहुत महत्वपूर्ण है कि तुम स्कूल जाओ.”

रिक्की: “मुझे इससे बुरा लगता है. मैं ह-ह-ह-कलाता हूँ और बाकी सब की तरह नहीं पढ़ सकता.”

उसकी माँ को अपने छोटे से लड़के के लिये बहुत ही दुःख महसूस हुआ, लेकिन वह निराश भी थी, क्योंकि यह पहली बार नहीं था कि रिक्की स्कूल नहीं गया था.

माँ: “तुमने मुझे न जाने के बारे में क्यों नहीं बताया? मैं तुम्हारी सहायता करती.”

बुरी बात यह थी कि उसे पढ़ने और लिखने में मदद करने के लिये उसकी माँ के पास पर्याप्त रूप से आइसलैंडिक बोलना सीखने के लिये समय नहीं था. उसे उसके भाइयों की देखभाल और घर चलाने का बहुत तनाव था. उसके पिता सारा दिन काम पर बाहर रहते थे, और रिक्की चीजों को स्पष्ट करने में अपने-आप को बहुत ही निराशाजनक रूप से धीमा पाता था, जब वह शाम को अपना गृहकार्य करने की कोशिश करता था.

रिक्की: “पहले दिन के बाद, मुझे फिर जाने में डर लगता था. और फिर उसके बाद जाने के लिये मेरा डर और बढ़ गया. और अब मैं स्कूल के काम में बहुत पीछे हूँ......और फिर से जाना और भी डरावना लगने लगा है.”

रिक्की उस दशा से गुजर रहा था जिसे उन दिनों “बिना कारण अनुपस्थित रहना” कहते थे; दूसरे शब्दों में, आप जितने लम्बे समय के लिये स्कूल नहीं जायेंगें, स्कूल वापिस जाना उतना ही मुश्किल है. इसलिये, लम्बे वार्तालाप के बाद और रिक्की को अपने-आप स्कूल वापिस लौटने के लिये समझाने की कोशिशों के बाद, उसके माता-पिता के पास और कोई चारा नहीं बचा था कि उसे घसीट कर वापिस ले जाया जाये, लातें मारते हुए और चिल्लाते हुए.

माँ: “मुखे खेद है, लेकिन तुम्हारे पिता को कल तुम्हे स्कूल वापिस ले जाना होगा.”

रिक्की, आंसुओं की बाढ़ में और अवज्ञा से, गुस्से की झल्लाहट दिखाते हुए: “नहीं, मैं नहीं जाऊँगा!”

माँ: “तुम्हे स्कूल जाना चाहिए जैसे हर कोई जाता है. तुम्हारा भाई जाता है. हमें उसके साथ कोई समस्या नहीं है.”

रिक्की: “नहीं, मैं नहीं जा रहा. मैं कभी स्कूल वापिस नहीं जा रहा.”

रिक्की साधारणतया अवज्ञाकारी रहता था, और अगले दिन, उसके पिता को, उसे मनाने की

बहुत सी असफल कोशिशों के बाद, उसे उठाना पड़ा और, लातें चलाते और रोते हुए, उसे जबरदस्ती कार से बाहर घसीट कर ले जाना पड़ा. इन अवसरों पर रिक्की को पहले प्राध्यापक के दफ्तर में बात करने के लिये ले जाया जाता था, जिसके दौरान उसके माता-पिता अपने हाथों को मरोड़ते रहते थे और उसका अध्यापक उसे समझाता था कि उसे कक्षा में लौट जाना चाहिए. रिक्की को फिर कक्षा में वापिस ले जाया जाता था, अपने भौंचक्के सहपाठियों के सामने अस्त-व्यस्त हालत में और शर्मिंदा होते हुए. बाद में स्कूल मनोचिकित्सक के साथ एक बैठक रखी जाती थी, लेकिन यह व्यर्थ ही जाती थी; रिक्की ने उससे कभी भी कुछ शब्दों से ज्यादा नहीं कहा. इन्ही घटनाओं की श्रृंखला की पुनरावृति बहुत बार हुई.

रिक्की के माँ-बाप ने वह सब किया जो वह उसकी सहायता के लिये कर सकते थे. निजी शिक्षक रखा गया. सप्ताहांत पर रिक्की की माँ उसे अध्यापक के घर ले जाती थी, जहाँ वह स्वयं सीधे-सीधे अपनी पढाई के लिये सहायता लेते हुए कुछ घंटे व्यतीत करता था. रिक्की अपनी माँ से प्रेम करता था, और यह थोड़ा सा पैदल चलना उसके लिये यादगार बन गया, क्योंकि उसने उससे मिला हुआ यह बिना शर्त का प्यार मन में संजो कर रखा था – इसके बावजूद कि उसने कितनी ही समस्याएं क्यों न पैदा की हों. बिना कारण स्कूल से गैरहाजिर रहने की बीमारी तब शुरू हुई जब रिक्की आठ वर्ष का था और इसने अपना भद्दा सिर कुई मौको पर स्कूल के हर वर्ष में उठाया, उसके माता-पिता को दुःख देते हुए, जब तक कि वह 11 वर्ष का नहीं हो गया.

कभी-कभी चिडचिडे मिजाज के अलावा, जो तब होता था जब उसके मन की नहीं होती थी, रिक्की ज्यादातर अच्छे मिजाज का खुश रहने वाला था. वह घर में अपनी माँ की सहायता करता था और स्थानीय स्टोर से स्वयं ही परचून का सामन उठाने के लिये नियमित रूप से जाता था. उसके माता-पिता का स्टोर में जमा खाता था और उसकी माँ हमेशा परचून की सूची लिख कर देती थी जिसे रिक्की को लाना होता था. किसी-किसी समय रिक्की शरारत करता था और एक चोकलेट को लिस्ट में जोड़ देता था. समस्या यह थी कि उसके लिखने का ढंग उसकी माँ की खुबसूरत सुसंस्कृत न्यू इंग्लैंड की पूरे अक्षरोंवाली लिखावट से बिलकुल भिन्न था, और परचून स्टोर परिचारक जो काउंटर के पीछे से सामान देता था बड़ी आसानी से उसकी गंदे तरीके से लिखी लिखावट से सूची में जोड़ी गई चीजों को पहचान लेता था. स्थानीय स्टोर की मालकिन एक एकल माँ थी और उसका संचालन वह स्वयं और उसका किशोर बेटा करते था, और माँ रिक्की की माँ को अच्छी तरह से जानती थी. जब दुर्भाग्य से माँ उसको सामान देती थी, वह परचून के सामान की सूची में उसकी गल्ती को एकदम पकड़ लेती थी, शक्की हो जाती थी, और पूछती थी, “क्या तुम्हारी माँ ने किशमिश/मुनक्का के साथ सूची में ‘चाकलेट की बड़ी बार लिखी है’?” जिसका उत्तर, यदि रिक्की देता था, तो एक दोषी की भांति, “अर्र...हाँ,” वह उसकी माँ से फिर से पूछने के लिये फोन कर देती थी. क्योंकि यह घटनाएं स्वाभाविक रूप से रिक्की के लिये थोड़ा अपमानजनक थीं, उसकी कोशिश यही होती थी कि बेटा ही उसको सामान दे, जो परवाह नहीं करता था, और बिना सवाल पूछे हमेशा ही रिक्की को चोकलेट की बार दे देता था. इसमें, बेशक, सतर्कता की जरूरत होती थी, थोड़ी सी धूर्तता और अवास्तविक कूटनीति, और जब भी आवश्यकता हो तो लाइन में दूसरों के आगे जाने का इन्तज़ार करना. सफलता के दिनों में जब उसकी कोशिशें कामयाब हो जाती थीं वह परचून के सामान के साथ घर लौटते हुए चोकलेट की बार को भसक लेता था.

रिक्की को रसोई की अलमारी के ऊपर वाले खाने में रखे हुए आरक्षित पैसों में से कुछ पैसे चुराने की आदत भी थी. वह चुराए हुए पैसों से अपने और अपने दोस्तों की केन्डी और सोडा के शर्बत की पार्टी करता था. हालांकि, यह गतिविधि एकदम से बंद हो गई, जब उसके दोस्तों में से एक ने, जिसे उस पार्टी में शामिल नहीं किया गया था, उससे विश्वासघात करके उसके पिता को बता दिया. इस घटनापूर्ण दिन में, बल्दुर एकदम निकला और जहां रिक्की केन्डी जल्दी-जल्दी खा रहा था, उसे ढूँढ़ लिया. उसके दोस्तों के सामने झिड़कने और उसके चूतडों पर थप्पड़ मारने से यह गुप्त गतिविधि ख़त्म हो गई. उसके इन सब दोषों के बावजूद, रिक्की एक पसंद आने वाला बच्चा था, वह अपनी माँ का पसंदीदा था हमेशा ही उसका एक विशेष दोस्त होता था.

11 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते, रिक्की गहरे भूरे बालों के साथ मध्यम कद-काठी का हो गया था. उसका हकलाना बरक़रार था, और उसे अपने स्कूल में सारे विषयों में दिक्कत रहती थी. वह अपनी हकलाहट के कारण दूसरों से ज्यादा बात नहीं करता था, वह स्कूल अंतरालों में अपने में ही रहने की कोशिश करता था. वह खेलों में भाग लेना पसंद नहीं करता था, और वह ख़ास तौर पर कक्षा के बाद सामूहिक नहाने में अपने उन्नत शिशिन को नियंत्रित करने में अक्षम होने के कारण जिम कक्षाओं को नापसंद करता था. स्कूल ने सभी बच्चों को तैरना सीखने की लिये अनिवार्य कर रखा था. परन्तु, रिक्की को पानी से बहुत ही पुराना भय था, वह साधारणतया उस स्कूल बस को, जो स्कूल के मैदान से बच्चों को नजदीकी शहर में तैरने की कक्षाओं के लिये, जिनमें तैरने के बाद सामूहिक तौर पर नहाना भी पड़ता था, ले जाती थी, छोड़ने में कामयाब हो जाता था.

फार्म, लक्जमोट

जैसा कि उस समय रिवाज हुआ करता था, रिक्की के माता-पिता ने रिक्की के लिये गर्मी की छुट्टियां बिताने के लिये एक फार्म पर इंतजाम किया. वह भाग्यशाली था कि आइसलैंड के उत्तर में एक पैतृक फार्म था जहाँ वह अपने अंकल, सिग्गी, के साथ रह सकता था. इसलिये, आठ वर्ष की उम्र से, मई में गर्मी की छुट्टियों की शुरुआत में, उसके पिता अपनी ओपल में जा कर उसे फार्म पर छोड़ आते थे. यह यात्रा उन्हें घुमावदार बजरी की सड़कों से, जो रिकिविक की तराई से ऊपर थीं, जंगल में और कुछ सुंदर घाटियों से वापिस नीचे की ओर ले जाती थी, में से होती थी. रास्ते में, वो कई उफनती नदियों पर, जो ऊँची पहाड़ियों से गरजते हुए नीचे आती थीं, बने तंग पुलों से गुजरते थे, कुछ पहाड़ियों की चोटियों से निकलता बर्फीला सफेद पानी लिये हुए, जबकि दूसरों में साफ़ झरनों का पानी होता था जो पहाड़ियों के कोनों से प्राकृतिक झरनों से निकल रहा था. इस अवसर पर, रिक्की केवल बारह वर्ष का हुआ था, और अब यह उसकी पांचवी गर्मी होगी जो वह अपने अंकल के फार्म पर बिताएगा.

फार्म, लक्जमोट, आइसलैंड के उत्तर में झाड़ियों की घाटी में स्थित है और शानदार ढंग से एक टीले के ऊपर खड़ा है, जो कि झाड़ियों की घाटी के पहाड़ से दूर नहीं है, जिसे रिक्की के पिता उस भूमि पर एक बहुत ही सुंदर पहाड़ के रूप में याद करते थे. लक्जमोट जिले में एक जाना-पहचाना फार्म है और 1835 से रिक्की के दादा-दादी और पूर्वजों की रियासत थी. उसके दादा, एक भूविज्ञानी, और उसकी दादी, एक लेखिका और एक औरतों के हकों की पक्षधर, बहुत वर्षों पहले मर चुके थे. जिले का डाककेंद्र, और साथ ही सारे देश का केन्द्रीय फोन केंद्र, फार्म पर स्थित था.

मुख्य सड़क के साथ ही, जो फार्म से दूर नहीं थी, एक बहुत बड़ी नदी थी जिसे झाड़ी घाटी की नदी कहा जाता था. इस नदी के ऊपर का पुल पुराना और तंग है, लेकिन जब रिक्की के पिता युवा थे और फार्म पर रहा करते थे, एक अलग पुल नदी पर था जो इससे भी तंग था और कभी-कभी पार करने में खतरनाक होता था, विशेषकर वसंत में बर्फ के पिघलने से. जैसे उन्होंने यह पुल पार किया, रिक्की के पिता की याद ताजा हो आई कि, जब वह बारह वर्ष का था तो पास के फार्म में डाक पहुंचाते हुए उसकी बाइसिकल बर्फ पर फिसल गई और पुल के दूसरी ओर उलट गई. वह बीस फुट नीचे चट्टान के मुहाने पर गिरा जो नदी के किनारे पर था. भाग्य से, जैसे ही हवा से नीचे गिरा,

उसका पत्रों का थैला ऊपर उठ गया, उसके कंधे के ऊपर, और उसके सिर के नीचे तकिये की तरह आ गया जैसे ही वह चट्टान पर गिरा. जब वह चट्टान पर गिरा तो बेहोश गया. बल्दुर ने आगे बताया, कि जब वह बेहोश पड़ा हुआ था, उसके पास एक बौनी स्त्री आई जो चट्टानों में रहती थी. उसने उसे गिरते हुए मरने से बचाया, और उसने उसके घावों का उपचार किया, उसने बहुत ही धीमे से फुसफुसाया,”जो मैं बोऊंगी, उसी की कटाई करुँगी, जो मैं बोऊंगी, उसी की कटाई करुँगी, जो मैं बोऊंगी, उसी की कटाई करूंगी.” कुछ समय बाद, जब उसे होश आया, वह खड़ा हो गया और उसने गिरने के बावजूद आश्चर्यजनक रूप से बढ़िया महसूस किया. उस दिन बाद में, वह अपनी टूटी-फूटी बाइसिकल के साथ फार्म पर लौट आया, और सब को हैरान करते हुए, एक भी खरोंच के बिना.

यह पहली बार नहीं था कि रिक्की ने बौनों के बारे में सुना था, जिन्हें आइसलैंडिक लोकसाहित्य में सामान्यतया “छुपे हुए लोग” कहा जाता है. लोकसाहित्य के अनुसार, वह भूमि पर बड़ी चट्टानों और उनके मुहाने पर रहते हैं और अपने काम पर जाते हैं, सामान्यतया किसानों की तरह, अपने जानवरों की देखभाल करते हुए और गर्मी में सूखी घास बनाते हुए. वह मनुष्यों को देख सकते हैं, लेकिन मनुष्य उन्हें नहीं देख सकते जब तक कि वह यह न चाहें कि उन्हें देखा जाये. वह सामान्यतया मनुष्यों के साथ शान्ति से रहते हैं, बशर्ते कि उनके इलाके में अशांति न फैलाई जाये. तो यह आइसलैंड में है, आज तक भी, वह सड़के बड़ी चट्टानों के इर्दगिर्द बनाई गई हैं जहाँ यह समझा जाता है कि बौने रहते हैं, क्योंकि उन कारीगरों को, जिन्होंने इन चट्टानों को, जहां यह प्राणी रहते हैं, हटाने की कोशिश की थी, बहुधा गंभीर चोटें आईं और मृत्यु भी हो गई थी.

जब रिक्की और उसके पिता फार्म पर पहुंचे, रिक्की को अपने अंकल, सिग्गी, सिग्गी की पत्नी, एलिन, और उनकी तीन बेटियों से; जो उससे साढ़े तीन वर्ष छोटी थीं, फिर से परिचित कराया गया. रिक्की के चेहरे पर सामान्यतया मुस्कराहट रहती थी, लेकिन उसने उनसे ज्यादा बात नहीं की, आंशिक रूप से उसकी हकलाहट के कारण और इसलिये भी क्योंकि वह शर्मीला था. बल्दुर, शहर वापिस जाने से पहले, अपने भाई, सिग्गी, के साथ उनके एक विशिष्ट वार्तालाप के लिये बैठ गया. केवल रिक्की ही ऐसे नहीं सोचता था कि इन दोनों भाइयों को ऐसे वार्तालाप करते देखना विचित्र था. वह एक कोण पर एक दूसरे से तिरछे आरामदायक कुर्सियों में बैठेगें. वह मुश्किल से ही कोई शब्द बोलते थे, लेकिन अपने सिरों को अक्सर हिलाते हुए मुंह-जुबानी गुरगुराहट और बेतुके शब्दों से एक-दूसरे की बातों को स्वीकार कर रहे थे. उनके बीच बहुत लम्बी चुप्पी भी होती थी. फिर वह खड़े हो गये और एक-दूसरे को विदा कही. बाद में, वह अपने जीवन-साथियों और परिवार के सदस्यों को “गहरी” बातचीत, उन निर्णयों जो उन्होंने उन मुद्दों के बारे में लिये थे जिन्हें जोर से कभी नहीं कहा गया, के बारे में बताते थे. यह उनके परवारों और उनके द्वारा जो उन्हें अच्छी तरह से जानते थे स्वीकार्य था कि उनके वार्तालाप ज्यादातर दूरसंवेदी होते थे. इस उल्लेखनीय अवसर के बाद, बल्दुर ने रिक्की की माँ को शहर से लौटने के कुछ समय बाद बताया कि वह और उसके भाई ने निर्णय लिया था कि उसके भाई की एक बेटी के बदले रिक्की को दे देना चाहिए, क्योंकि उसके चार बेटे थे और सिग्गी के केवल बेटियां थीं, और फार्म को अपने हाथ में लेने के लिये कोई पुरुष वारिस नहीं था.

बल्दुर ने अपनी पत्नी को बताया कि रिक्की ने पिछली गर्मियों में यह दर्शाया था कि वह एक अच्छा कामगार था, और इसके अलावा, शहर में रिक्की को संभालना उनके लिये मुश्किल था. इसलिये, वह इस बात पर सहमत हो गये हैं कि अपने अंकल की संरक्षता में फार्म पर काम करने देना निस्संदेह उसके लिये अच्छा होगा और उसे भविष्य में एक अच्छी जीविका प्रदान करेगा. लेकिन इस विचार का रिक्की की माँ ने दहशत के साथ स्वागत किया और यह संकल्प किया कि फार्म लक्जमोट पर यह उसकी आखिरी गर्मी होगी.

रिक्की को जब भी अपनी माँ से दूर जाना पड़ता था तो वह उदास हो जाता था और दुगना उदास हो जाता जब उसके पिता उसे छोड़ कर जाते थे, फार्म पर छोड़ने के बाद. उसके पिता हरेक गर्मी में सामान्यतया कम से कम एक बार एक सप्ताहांत पर सलमान मछली पकड़ने के लिये आते थे, क्योंकि झाड़ी घाटी की नदी का एक हिस्सा फार्म का था, और नदी में काँटा डालने का कोई मूल्य नहीं लगता था. इन अवसरों पर, रिक्की के पिता उसकी माँ से एक परवरिश का पैकेज लाते थे जिसमें एक पत्र, कुछ केन्डी, और ताजा फल होता था. रिक्की अपनी चचेरी बहनों से केन्डी बांटने को मजबूर हो जाता था, यद्दपि हिचकिचाहट से, परन्तु पत्र, जिस पर “प्यार, मम्मी”, हस्ताक्षर होते थे उसके लिये विशिष्ट और दिल को छूने वाला होता था. इन मछली पकड़ने वाली यात्राओं में से एक यात्रा के अंत में, उजब सके पिता जाने वाले थे, और रिकविक शहर वापिस लौटने से पहले वह रसोई में काफी का अंतिम प्याला पी रहा था, तो रिक्की कार की डिकी में छिप गया. क्योंकि रिक्की कहीं दिखाई नहीं दे रहा था, जब बल्दुर जाने के तैयार था, सभी ने यह मान लिया कि वह अनाजघर की ओर कुछ काम करने के लिये गया होगा, इसलिये उसका पिता उसे न पा कर बिना अलविदा कहे चला गया. परन्तु कुछ घंटो की ड्राइव के बाद रिक्की ने सन्दूक की डिक्की के ढक्कन पर मारना शुरू कर दिया, अपने पिता को सचेत करने के लिये, जिसने कार को रोक लिया और उसे वहां छिपा हुआ पाया. इस एक अवसर पर, रिक्की ने घर पर कुछ रातों का आनंद उठाया, लेकिन रिकविक में कुछ खास करने को था नहीं, क्योंकि उसके सभी दोस्त गर्मियों में रियासतों पर गये हुए थे. उसका सबसे बड़ा भाई गर्मी के शिविर में गया हुआ था और उसके दो छोटे भाई और उसकी शिशु बहन उसके साथ खेलने के लिये बहुत छोटे थे. इसलिये वह तीन दिनों के बाद सार्वजनिक बस पर लक्जमोट लौट गया. गर्मी के महीनों में अपने परिवार से यह अलगाव, जो तब शुरू हुआ था जब वह आठ वर्ष का था, उसके लिये भावनात्मक रूप से संभाल पाना मुश्किल था, और इसने उसे कठोर बना दिया था; कुछ लोग कहेंगे कि इसने उसे जल्दी बड़ा होने में और आदमी बनने में सहायता की. [क्रमशः........(अगले अंक में पढ़ें रिक्की ने गर्मी छुट्टियाँ कैसे व्यतीत की और वह बौनों के देश में कैसे पहुँचा)]

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