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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



उन्मुक्तता


राजेन्द्र वर्मा


 
प्रेम में उन्मुक्तता के प्रति समर्पित हो गये,
काल के नद पुष्प-जैसे हम विसर्जित हो गये।
 
देह-दर्शन में कभी हमको नहीं विश्वास था,
किन्तु क्या कारण, इसी में हम समेकित हो गये।
 
एक संस्कृति थी कभी, जो विश्व की सिरमौर थी,
आज उस संस्कृति के वाहक ही उपेक्षित हो गये।
 
छल-कपट-ईर्ष्या-अहम्, मद-मोह से संरुद्ध हम,
एक कल्पित तुष्टि के हाथों पराजित हो गये।
 
अब समय आया है ऐसा, राम ही रक्षा करें,
वृद्ध माता औ’ पिता से पुत्र वन्दित हो गये।
 
   

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