Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



मुसाफिर की मंजिल


नरेश गुर्जर


	                  			
नजर आती है मुसाफिर को मंजिल दूर बहुत
कब का निकला है वो घर से फिर भी पड़ाव कोई पड़ा नहीं

अब जो थकने लगा तो सोचा कि कर लें  आराम किसी दरखत तले
पर आलम क्या बताये, सुखा था दरखत पता एक भी उस पर बचा नहीं

मायूसी थोड़ी देर तो थी छाई, उदासी भी शायद उसको थी घेर आई
चलता रहा सफर पर अपने एक पल को भी रूका नहीं

जिद थी उसकी कि अब रूके तो मंजिल पर रूके
यूं राह में रूकना अब अच्छा नहीं

जब पहुंचा वो मंजिल पर तो गस खा के गिर पड़ा
जवानी में जो किया था चलना शुरू, बुढ़ापे में फिर उठा नहीं


 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें

www.000webhost.com