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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



मुल्क़ किस दौर में


अबुज़ैद अंसारी


बेगुनाहों के सीनों में धँसे खंजर देखूँ 
हाय अफ़सोस ! कब तक यही मंज़र देखूं 
गंगा बहती है जहाँ उसकी ज़मीं पर कब तक 
ख़ून के बहते हुए और कितने समुंदर देखूँ 


मुल्क़ जिसमें कभी राधा, कभी राम हुए 
जहाँ गौतम जहाँ नानक-ओ-निजाम हुए 
जहाँ गाँधी, जहाँ इक़बाल-ओ-कलाम हुए 
जिसकी मिट्टी पे ख़ुदा के इनआम हुए 


आज उस पर ही नफ़रत के घने साये हैं 
हाय हम मुल्क़ को किस दौर में ले आये हैं 

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