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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



गीत


तुम्हारा मौन सुनूँगी


सुनीता काम्बोज


    
बैठूँगी नजदीक तुम्हारे
और तुम्हारा मौन सुनूँगी 

छूट गए जो इन हाथों से
ढूँढ रही हूँ उन लम्हों को
बन कर मैं चंचल सी नादिया
हरपल तेरे साथ चलूँगी
बैठूँगी....

साँसों की लय बतलाएगी
मन की पीड़ा बह जाएगी
धड़कन का संगीत बजेगा
उर के सब जज्बात पढूँगी
बैठूँगी....

आँखों के प्याले छलकेंगे
निर्मल से मोती ढलकेंगे
तुम हिम्मत बन जाओ मेरी
टूटे सारे ख़्वाब बुनूँगी
बैठूँगी...
   

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