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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



गीत


बंजर हो जाएगी धरती


सुनीता काम्बोज


    
बंजर हो जाएगी धरती,फिर मानव पछताएगा
बूंद-बूंद को तड़फोगे  फिर,ऐसा भी कल आएगा
 
जंगल काटे शहर बसाए,करता मानव  मनमानी
नदियों में विष घोल दिया है ,जहरीला सारा पानी
मन की इच्छाओं का ये घट, मुश्किल ही भर पाएगा
बंजर---

तोते चिड़ियाँ और पपीहा, नीड़ नहीं बुन पाते हैं
कोयल भँवरे हलपल अपनी,पीड़ा के सुर गाते हैं
इक मानव ही शेष रहेगा,बाकी सब मिट जाएगा
बंजर--

आने वाली सभी पीढ़ियाँ , तुझको ही धिक्कारेगी 
ये धरती अपने जायों के ,हाथों ऐसे हारेगी
इक दिन ये लाचार समन्दर,तांडव भी दिखलाएगा
बंजर-- 
   

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