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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



मन उद्ग्विन सा रहता है


डॉ० अनिल चड्डा


मन उद्ग्विन सा रहता है
जाने क्या क्या कहता है 
जीवन के अर्थों में ये
हरदम उलझा रहता है 

नाते-रिश्ते क्या होते हैं
क्यों मिलते, क्यों खोते हैं
यूँ ही बिन किसी नाते के 
कोई क्यों अपना लगता है

क्या धोखा है, क्या निष्ठा
समझ नहीं दिल पाता है
फिर भी बिन सोचे समझे
विश्वास कोई क्यों करता है

किसको अपना बोले हम 
किसको माने गैर ये दिल 
अपने दे जाते चोट बड़ी
गैर से दिल क्यों बहलता है 

चलते-चलते राहों पर 
राह बदल क्यों जाती है 
राह नई मिल जाने पर 
पुरानी राह क्यों चलता है

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