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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



दर्द पी मैं दवा हो गया


विनोद शर्मा "सागर "


	                  			
नींद है या नशा हो गया।
दर्द पी मैं दवा हो गया।।

साथ तेरा मिला ना मुझे। 
आदमी मैं बुरा हो गया।।

छू लिया इक नज़र से मुझे 
मैं  खिला फूल सा हो गया।

हाथ से ज़ेब में जब गया।
हर सिक्का झुनझुना हो गया।।

आग में जल गयीं रोटियाँ ।
भूख का फैसला हो गया। ।

ऐब दिल के जुबां पर घुले। 
चाँद हर चेहरा हो गया।।

तख़्त-ओ ताज जब मिल गया।
रहनुमा बेवफ़ा हो गया ।।

झूठ दिल में समाया सभी।
धुंधला आइना हो गया। ।

टूट कर प्यार में मैं यहाँ। 
दर बदर लापता हो गया।।

लो चलो चुक गयी ज़िन्दगी। 
मौत का आसरा  हो गया।।

दब गया चाहतों के तले।
आदमी अधमरा हो गया।।

क्यूँ बिछड़ मंज़िलों से रस्ता। 
इस तरह सरफिरा हो गया।।

          

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