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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



ख़ुद हश्रसामां हो रहा है आदमी


पीताम्बर दास सराफ "रंक"


श्रापों से नालाॅ॓ हो रहा है आदमी
ख़ुद हश्रसामां हो रहा है आदमी।।१।।

इतने उगा लिये कांटे हैं अपने लिये
कष्टों से पारा हो रहा है आदमी।।२।।

किसी ने कहा ना था जुरम बोने को पर
उसपे आमादा हो रहा है आदमी।।३।।

रखकर ख़ुदा को ताक पर ख़ुद तन गया
कैसा अजब सा हो रहा है आदमी।।४।।

ये "रंक" कैसा शोर है ज़ीस्त के दर
यम का निवाला हो रहा है आदमी।।५।।

 

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