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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



ठहर गया हूँ मैं


डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’


 
एक पल को ठहर गया हूँ मैं,
सबने समझा कि मर गया हूँ मैं।

हर तरफ नफ़रतों की साजिश है,
दौरे हाज़िर से डर गया हूँ मैं।

मुफलिसी ने क़दम को रोक दिया,
चाहतों से मुकर गया हूँ मैं।

मुल्क का हाल देख करके अब,
खूब गुस्से से भर गया हूँ मैं।

आजकल रूह के सफ़र पर हूँ,
जिस्म को पार कर गया हूँ मैं।

इक नज़र तुमने डाल दी मुझ पर,
और देखो संवर गया हूँ मैं।


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