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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



सानी नहीं है कोई भी उसके शबाब का


देवी नांगरानी


    
सानी नहीं है कोई भी उसके शबाब का
हर लफ़्ज़ बेमिसाल है उसकी किताब का

कलियां उदास-उदास हैं गुलशन में आजकल
चेहरा भी उतरा-उतरा है अब तो गुलाब का

पढ़ने को यूँ तो उनकी मिली नेक-नामियाँ 
आया न हाथ कोई भी सफ़्आ सवाब का

माँगा हिसाब अपनी वफ़ाओं का जब कभी
ज़ालिम ने फाड़ डाला वो खाता हिसाब का

जो रोकती थी पाँव को ज़ंज़ीर अब कहाँ
परदा ही जैसे उठ गया रस्मे-हिजाब का

वो बन सँवर के आ गए ‘देवी’ जो सामने                                                     
उड़ने लगा है होश क्यों आखिर जनाब का

 

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