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वर्ष: 2, अंक 34, अप्रैल(प्रथम), 2018



हिंदी जुबाँ की ख़ुशबू


देवी नांगरानी


    
लोरी सुना रही है, हिंदी जुबाँ की ख़ुशबू
रग-रग से आ रही है, हिन्दोस्ताँ की ख़ुशबू

भारत हमारी माता,  भाषा है उसकी ममता
आंचल से उसके आती सारे जहाँ की ख़ुशबू

भाषा अलग-अलग है, हर क्षेत्र की ये माना
है एकता में शामिल हर इक ज़बाँ की ख़ुशबू

भाषा की टहनियों पे हर प्राँत के परिंदे
उड़कर जहाँ भी पहुंचे, पहुंची वहाँ की ख़ुशबू

शायर ने जो चुनी है शेरो-सुख़न की भाषा
आती मिली-जुली सी उसके बयाँ की ख़ुशबू

महसूस करना चाहो, धड़कन में माँ की कर लो
उस अनकही ज़बां से, इक बेज़बाँ की ख़ुशबू

परदेस में जो आती मिट्टी की सौंधी- सौंधी
ये तो मेरे वतन की है गुलिस्ताँ की ख़ुशबू

दीपक जले है हरसू भाषा के आज ‘देवी’
लोबान जैसी आती कुछ-कुछ वहाँ की ख़ुशबू। 

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