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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 83, अप्रैल(द्वितीय), 2020

कोरोना

सपना परिहार

"आग लगे इस कोरोना में,जीना मुहाल कर दिया",काम वाली बाई बड़बड़ाते हुये घर मे घुसी तो मालकिन चिल्लाई-"सीमा ,वही रुक जा! गेट के पास पानी और साबुन रखा है ,पहले हाथ धो फिर घर मे आना। सीमा तो जैसे चिल्लाना ही भूल गयी और हाथ-पाँव धोकर घर मे दाखिल हुई।

"थोड़ी साँस ले-ले फिर बता क्या हुआ?"मालकिन ने सीमा से कहा।

क्या बताऊँ दीदी,बोलते-बोलते सीमा रुआँसी हो गयी। जब से ये बीमारी आई है,हम गरीबो की तो हर तरफ से परेशानी बढ़ गयी है।काम बन्द,रोजी -रोटी का जुगाड़ बन्द,जरूरत का सामान खत्म ।और क्या क्या बताऊँ आपको। ऊपर से कहीं आने -जाने की मनाही ।छोटी सी खोली में बच्चों ने घर को खेल का मैदान बना दिया ,बेचारे बाहर खेल भी नही पा रहे ।

"वो तो ठीक है पर तू साफ-सफाई का ध्यान तो रख रही है न" मालकिन ने सीमा से कहा ।

"हाँ मालकिन" ,बच्चों को बार -बार हाथ धोने को बोलती हूँ, खांसी होने पर रुमाल इस्तेमाल करने को बोली हूँ और किसी से सीधे न मिलने को बोली हूँ।

अरे वाह सीमा तू तो समझदार हो गयी है,हँसते हुए मालकिन ने कहा।

ये सब तो हम टीवी में रोज देख रहे है न और मोदी जी भी यो ये ही बात बार -बार बोल रहे है।

हाँ सीमा सावधानी में ही सुरक्षा है ।अपना और अपने परिवार का ध्यान रखना अब अंदर जा और काम निपटा ले ।

"मैं तो जा ही रही थी दीदी ,आपने ही मुझे बातों में बिठा लिया,हँसते हुए सीमा रसोईघर में चली गई।


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