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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 83, अप्रैल(द्वितीय), 2020

कोरोना संकट पर दोहे

आकाश महेशपुरी

ऐसी विपदा आ गयी, हुये सभी मजबूर। लम्बी दूरी नापते, पैदल ही मजदूर।। आया रोग जहाज से, सहम गए हैं लोग। लाये इसे अमीर पर, रंक रहे हैं भोग।। जीवन की हर ओर ही, सूख रही है डाल। मन रोता है देखकर, इस दुनिया का हाल।। शहर नहीं अब गाँव भी, लगते हैं वीरान। अनहोनी की फिक्र में, अटक गई है जान।। नया युद्ध कौशल यही, उचित यही है ढंग। घर में छुपकर ही लड़ें, कोरोना से जंग।।

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