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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 59, अप्रैल(द्वितीय), 2019

विधान

राजीव कुमार

संजय की पत्नी और उसकी मां में तिल का ताल बनकर झगड़ा हो गया था। झगड़े का कारण महज एक साड़ी थी। साड़ी खूबसूरत होने के कारण सास और बहू दोनों को पसंद थी। संजय की पत्नी सुधा ने एक दिन कहा, ‘‘देखो जी, ये साड़ी तो हमको ही चाहिए। मां को पहनकर अब कहां जाना है?’’

‘‘ठीक है, मां से बात करूंगा।’’

संजय की मां कमला ने कहा, ‘‘नहीं बेटा, इसमें जड़ी का काम इतना बारीक किया गया है कि वर्षों की इच्छा पूरी हो गई। ये साड़ी तो मैं ही रखूंगी।’’

एक तरफ फर्ज और एक तरफ कर्ज वाली स्थिति देखकर संजय संकट में पड़ गया, न तो मां से झगड़ा कर सकता है और न तो पत्नी से ही लड़ सकता है। ऐसा ही चलता रहा। सास और बहू में अनिश्चितकालीन बात बंद। सास और बहू के बीच की कड़ी संजय के पांव में बेड़ी और हाथ में हथकड़ी सा जीवन हो गया।

संयोगवश संजय के पिता की दुर्घटना में मृत्यु हो गई। घर में शोक का माहौल छा गया। श्राद्ध के बीच में ही सास ने बहू से कहा, ‘‘बेटी, अब मेरे लिए ये साड़ी बेकार है। अब तो हमको सफेद रंग की साड़ी जीवन भर पहनना है। रख लो।’’ सास की कठोर हो चुकी आंखों में भर आए पानी को देखकर सुधा गले लिपटकर रोने लगी।

आज मां-बेटी की मिलन हुआ।


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