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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 82, अप्रैल(प्रथम), 2020

बैंक का एक दिन

विज्ञा तिवारी

बैंक परिसर आज सुबह से ही कुछ खाली सा था। लोगों की भीड़ कम होने के साथ साथ २-१ बैंक कर्मचारी भी छुट्टी पर थे। कोई कोई दिन जैसे बेमन सा शुरू होता है। वैसा ही कुछ आज का दिन था मेरे लिए। खैर समय बीतने लगा और काम होने लगा। यही कोई दिन के १:१५ बजे होंगे तब तक हमारी एक पेंशन धारक ग्राहक ने अपने लड़के को लेकर बैंक परिसर में प्रवेश किया। ये अधेड़ उम्र की महिला नवम्बर माह में अपना जीवन प्रमाणपत्र पंजीयन कराने आयी थीं। उनका होनहार लड़का उनकी मदद करने को उनके साथ आया था। ऐसा क्यूं होता है कि कुछ लोग अनायास ही याद रह जाते हैं।

पिछले महीने दीवाली से पहले भी ये लड़का अपनी मां के साथ मेरे पास आया था। पेंशन प्रकरण करवाना चाहता था अपनी मां के नाम पर। मैंने कारण पूछा तो बोला छोटी बहन की शादी के खर्चे के लिए। मुझे भी कारण सच लगा तो मैंने आगे पूछा की आप क्या करते हैं? उसने बोला मैं रेलवे में कार्यरत हूं एवं मेरी तनख्वाह आपके बैंक में ही आती है, आप चाहें तो देख लीजिए। मैंने कंप्यूटर में देखा तो पाया कि वो सच कह रहा था। मैंने फिर पूछा, तो आप इस प्रकरण में अपनी मां की गारंटी लेंगे? उत्तर देने से पहले वो थोड़ा सकुचाया फिर रुक कर बोला जी मेरा रिकॉर्ड ठीक नहीं है पर बहन ले लेगी। मुझे थोड़ा अजीब लगा पर ठीक है कहकर अपने उप स्टाफ को बोल कर प्रकरण का फॉर्म दिलवा दिया और भर कर लाने को बोला। साथ ही ये भी बताया कि प्रकरण से पहले मैं एक बार घर का निरीक्षण करने आऊंगी और सब कुछ ठीक लगा तो ही आगे कोई बात होगी।

अगले दिन उसके घर का निरीक्षण करके पता चला कि उसकी मां (श्रीमती राजकली) अपनी मां के घर अपनी तीसरी और सबसे छोटी बेटी के साथ रहती हैं। घर का माहौल मुझे अजीब लगा। मैंने लड़के से पूछा और आपकी पत्नी और बच्चे कहां हैं? फिर उसने थोड़ा रुक कर कुछ सोचते हुए बोला जी बच्चे तो स्कूल गए हैं और पत्नी कुछ काम से अपने पिता जी के घर गईं हैं। उसके जवाब देने के तरीके ने तो मेरे मन में संशय पैदा किया पर उसका जवाब कहीं से भी संशय का पात्र नहीं था। खैर कुछ और जानकारी लेकर मैं वहां से निकल गई। बैंक परिसर में आकर मैंने उनकी आवश्यकता को ध्यान में रखकर तुरंत प्रकरण त्यार किया, तब तक वो लड़का फिर मेरे सामने आकर बैठ गया। बोला मैडम कितना पैसा मिलेगा? मैंने कहा मैनेजर की हद में सिर्फ २ लाख आता है, तो उतना ही हो पाएगा। मैं कहीं ना कहीं उसके व्यवहार से अब ऊब रही थी पर उसकी मां और बहन के लिए मैं शांत थी। उसने फिर कहा जी इतने में तो कुछ नहीं हो पाएगा, कम से कम ४ लाख कर दीजिए। अब मेरा सब्र जवाब दे चुका था। मैंने कहा आपको क्या लगता है मैं यहां सब्जी बेच रही हूं कि नहीं जी इतने में नहीं तो इतने में हो जाएगा? बैंक के नियमों को मैं आपके अनुसार ताक पर रख दूं? वो थोड़ा घबरा गया। तब तक मैनेजर आए और बोले क्या हुआ? उसने अपनी बात बोली, सुनकर सर बोले कि इनका प्रकरण आंचलिक कार्यालय को भेज दो क्यूंकि इनको जितना चाहिए वो वहीं हो सकता है। मैंने हां में सिर हिला कर सारे कागज़ तयार किए और शाम में भेज दिए।

दो दिन बीतने के साथ ही फिर शुरू हुआ उस लड़के का बैंक में चक्कर लगाने का सिलसिला। कब हो जाएगा मैडम? कोई और कागज़ भी लगेगा क्या? इतना समय तो किसी बैंक में नहीं लगता, सारे सवाल और मेरा एक ही जवाब कि अब मेरे हाथ में कुछ नहीं जब उपर के अधिकारी जवाब देंगे तब ही मैं आपको कुछ बता पाऊंगी। कुछ दिनों बाद सारे कागज़ वापिस आ गए। उस पर लिखा था कि श्रीमती राजकली जी की बेटी के अलावा भी किसी और को गारंटी लेनी पड़ेगी। मैंने तुरंत फोन कराया और उसे बैंक आने बोला। उनके लड़के को मैंने समझाया कि अब आपको गारंटी लेनी पड़ेगी वरना नहीं होगा। उसने गुस्से में बोला मैं अपनी गारंटी नहीं दूंगा, और चला गया। उसके सारे कागज़ मेरे हाथ में ही रह गए। मैंने उसके जाने के बाद सब कुछ संभाल कर रख लिया।

उस दिन के बाद वो लड़का मुझे आज बैंक परिसर में नज़र आया था और आते ही वो लड़का मेरे पास आकर बोला, मेरे सारे कागज़ वापिस दे दीजिए। मैंने कागज़ निकाले और उसके हाथ पर रख दिए। तब तक मेरी क्लर्क मैडम बोली तो क्या अब इनको लोन नहीं चाहिए? तो मैंने उस लड़के को बुलाया और पूछा तो क्या अब आपको वाकई लोन नहीं चाहिए? उसने कहा नहीं। फिर वो अपनी मां का काम करने में दौड़भाग करने लगा और मैं भी अपने काम में लग गई।

केवल १-२ मिनट ही बीते होंगे कि श्रीमती राजकली जी अपने लड़के को व्यस्त देख कर मेरे पास आयीं और बोली कि मुझे आपसे कुछ पूछना है, मैंने बोला जी बताइए। इस पर वो बोली पर धीमे बताइए मेरा लड़का ना सुन ले। फिर उन्होंने पूछा कि एक ८ साल की लड़की के नाम पर अगर मैं एसआईपी करवाना चाहती हूं तो उसके लिए क्या लगेगा? मैंने कहा नाबालिग के नाम पर निवेश नहीं होता है, आप अपने नाम करवा कर उस बच्ची को वारिस कर दीजिए। इस पर वो बोली अगर मुझे कुछ हो गया तो पैसा उसे ही मिलेगा ना? मैंने बोला जी उसी को मिलेगा। उनको परेशान देख कर मैंने उनसे बैठने के लिए कहा। वो बैठ गईं, बोली बिटिया क्या बताएं बहुत परेशान हैं। वैसे तो मुझे किसी के बारे में जल्दी कुछ भी जानने की उत्सुकता नहीं होती पर पता नहीं क्यूं मैंने उनसे पूछा आपके लड़के को उसके पिता जी की जगह नौकरी मिली है या उसने कोई परीक्षा दे कर हासिल की है? इस पर वो बोलीं मेरी गलती थी, लड़का है सोच कर इसको नौकरी दिला दी और अपनी बड़ी लड़की को मना कर दिया। मेरी लड़कियां इससे ज्यादा पढ़ीं हैं पर मेरी बुद्धि कि मैंने सोचा इकलौता लड़का है इसी का सहारा है तो इसी को दिलवा दी। जब से नौकरी मिली ये अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अलग हो गया। और अपनी तीनों बहनों की ज़िम्मेदारी लेने से मना कर दिया। अपनी तनख्वाह का लेश मात्र भी ये मुझे नहीं देता। मैं और मेरा भगवान ही जानता है कि दो लड़कियों की शादी मैंने कैसे की बिना अपने पति के। इतना कहते कहते उनकी आंखे भर गईं। मैंने अपने स्टाफ को पानी लाने बोला, पानी पी कर वो थोड़ा शांत हुई। मैंने फिर हिम्मत जुटा कर पूछा तो लोन क्यूं चाहिए था आपको? बोली मुझे नहीं चाहिए था बिटिया वो तो इसने (लड़का) अपनी तीसरी बहन की शादी के गहने बेच दिए थे और अपनी उधारी चुका आया था और जब मुझे पता चला तो बोला आप अपने नाम पर लोन ले लीजिए और गहने बनवा लीजिए। लोन की किश्त मैं अपनी तनख्वाह से भर दूंगा। पर बिटिया अच्छा हुआ की लोन नहीं हुआ।

मैं सब कुछ सुन रही थी। थोड़ा रुक कर माता जी बोली एक बात समझ आ गयी बिटिया, पूरी दुनिया लड़कों के पीछे भागती है पर लड़कियां उससे ज्यादा करती हैं। ये सब धारणाएं गलत हैं और मैंने भी वही गलती की। उनकी ये बात कुछ चुभ गई मुझे, शायद एक लड़की हूं इसलिए। फिर वो बोली जरा इतना बता दो पेंशन आती कितनी है? मेरी साथी कर्मचारी ने बताया उन्हें तो उनका लड़का बोला "अरे बताया तो था"! फिर धीमे से उसने अपनी मां को चुभने वाले कुछ और शब्द भी कहे होंगे जो किसी को सुनाई नहीं दिए। कुछ समय बाद मां बेटे चले गए और मुझे दे गए लिखने का एक कारण। इतने में हमारी क्लर्क मैडम बोली आइए मैडम लंच का वक़्त हो गया, आज खाना नहीं खाना क्या? मैंने हां में सिर हिलाया और कुर्सी से उठ गई।


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