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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 58, अप्रैल(प्रथम), 2019

दोहे

मनोज जैन "मधुर"

● व्यर्थ कभी जाता नहीं, किया गया संघर्ष। अंधियारे में दीप ने, हँस हँस बांटा हर्ष।। ● नन्हें दीपक ने दिया, एक बड़ा सन्देश। सदा फैलती त्याग की,अनुपम कीर्ति अशेष।। ● रखा ध्यान में लक्ष्य को,और जला अविराम। एक दिए ने कर दिया, तम का काम तमाम।। ● लाख गुना हो आयतन, मीलों हो विस्तार। हुई दीप के सामने, अंधियारे की हार।। ● जला आखरी साँस तक, खूब निभाया धर्म। दीप हमें सिखला गया, क्या होता है कर्म।। ● मैं हूँ वंशज सूर्य का ,तम को हरना काम। नन्हा सा मैं दीप हूँ, जलता हूँ अविराम।। ● जलकर रौशन कर गया, जग में अपना नाम। दीपक आया किस कदर ,मानवता के नाम।। ● मिला दीप की ज्योति से,ऊर्ध्व गमन का बोध। केवल ज्ञानी कर सका, इसी दृष्टि पर शोध।। ● रत्ती भर आया नही, अंधियारे को रास। दीपक ज्योति प्रकाश ने,मिलकर रचा उजास।। ● जली वर्तिका दीप में, अपना नेह निचोड़। अंधियारा पीछे हटा, अपने हाथ झिंझोड़।। ● जगर मगर दीपक जले, हरे कलुष तम शोक। जैसे प्राची से निकल, तम हरता आलोक।। ●


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