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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



साहब....आधा हिंदुस्तान सफर में रहता है


पारसमणि अग्रवाल


चौकिये मत ....जी हां..... यही सच्चाई है, आधा हिंदुस्तान सफर में रहता है। अरे...अरे विश्वास नहीं होता तो जनाब जरा बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन का मुआयना कर लीजिये। इस बात से आप भी इंकार नहीं कर सकते कि एक बड़ी आबादी प्रतिदिन सफर में रहती है। एक बड़ी आबादी के प्रतिदिन सैर-सपाटा करने के वाबजूद रेलवे स्टेशन एवं बस स्टेण्ड मूलभूत सुविधाओं का मोहताज दिख रहा है। धरातल पर सच्चाई का पता लगाने के लिये जब उत्तर प्रदेश के झाँसी मण्डल का निरीक्षण किया। स्थिति बेहद ही नाजुक और गम्भीर दिखाई पड़ रही थी जिसे देखकर दिलों-दिमाग में सिर्फ एक सवाल जन्म ले रहा था कि मण्डल के मुख्य रेलवे स्टेशन का जब ये हाल है तो अन्य रेलवे स्टेशन की तस्वीर क्या होगी? यात्रियों के लिये प्रत्येक श्रेणी के अलग-अलग एक एक प्रतीक्षाग्रह होने के वाबजूद महिलाएं, पुरुष एवं बच्चे सड़क पर होने को बाध्य दिख रहे थे कुल मिलाकर यह कहना बिल्कुल भी अनुचित नही होगा कि मण्डल मुख्यालय के मुख्य रेलवे स्टेशन पर बने प्रतीक्षालय रायते में जीरे के बराबर साबित हो रहे है क्योंकि प्रतीक्षालय में बमुश्किल 36 कुर्सी पड़ी होगी जो यात्रियों के साथ तू डाल-डाल, मैं पात-पात का खेल खेलने का कार्य करती प्रतीत हो रही। निरीक्षण के दरम्यान पाया कि टिकट बुकिंग हाल , प्रतीक्षालय एवं स्टेशन द्वार के साथ -साथ नन्हें-मुन्ने बच्चों सहित यात्री अपनी गाड़ी के इंतजार सड़क पर करने को विवश मिले जिससे वह सही समय पर अपनी यात्रा को आगाज से अंजाम तक पहुँचा सके और अपने शौक , अपनी जरूरत को पूरा कर सके। रेलवे स्टेशन व बस स्टैण्ड पर सुविधाओं को लेकर हमारे जनप्रतिनिधि हमारी सरकारें बड़ी-बड़ी ढींगे तो हांकती है लेकिन गहराई से इन तथ्यों की जाँच करें तो परिणाम बेहद ही निराशाजनक मिलेंगे। जिस स्टेशन से हजारों यात्री नियमित यात्रा करते है उस स्टेशन पर प्रतीक्षालय के रूप में महज कुछ लोगों की व्यवस्था क्या यही है सुविधाओं युक्त रेलवे स्टेशन? रेलवे स्टेशनों पर अक्सर देखने को मिल जायेगा अपना सफर तय करने के लिये सैकड़ो लोग प्लेटफार्म, टिकट हॉल के साथ साथ पैदल पुल और स्टेशन के बाहर अव्यवस्थित तरीके से अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा को मजबूर होते है। सड़कों पर इंतजार कर रहे यात्रियों के आस-पास आवारा जानवर भी घूमते आराम फरमाते बड़े ही आसानी से देखे जा सकते है। रेलवे की ओर से अक्सर सुनने को मिलता है कि "यात्रियों की सेवा में हम सदैव तत्पर है।" लेकिन वर्तमान में जिन हालातों से रेलवे स्टेशन जूझ रहे है यदि गम्भीरता और वास्तविकता से आंकलन किया जाये तो यह पंक्ति हास्यपद साबित होगी जो यात्रियों के साथ भद्दा मजाक के सिवाय और कुछ नही है। यदि वास्तव में यात्रियों की मूलभूत सुविधाओं एवं सुरक्षा के लिये रेलवे वचनबद्ध है तो कम से कम उसे ऐसे रेलवे स्टेशनों पर रैन बसेरा का निर्माण अवश्य कराना चाहिये जँहा यात्री सड़क पर सोने को मजबूर है। बड़े रेलवे स्टेशनों पर रैन बसेरा बन जाने से यात्री अव्यवस्थित तरीके से न सिर्फ सड़क पर आवारा जानवरों के साथ वक्त गुजारने पर मजबूर होंगे बल्कि खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे। अपनी कलम को विराम देते हुये एक यात्री होने के नाते मै सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि साहब भ्रमित नहीं काम कीजिये क्योंकि प्रतिदिन आधा हिंदुस्तान सफर में रहता है।

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