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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



हिन्दी दिवसः एक औपचारिक पर्व


अंकित भोई ’अद्वितीय’


विभिन्न भौतिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु अर्थाेपार्जन की गला काट प्रतिस्पध्र्दा के दौर में हिन्दी दिवस भी आया और चला गया मानो दिवाली के धमाकेदार आतिशबाजी के बीच कोई जुगनु अपना अस्तित्व तलाश रहा हो। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् संविधान में हिन्दी भाषा के संरक्षण व पोषण हेतु बड़ी-बड़ी दलालें दी गई किन्तु तमाम खोखले वादों व योजनाओं के बावजूद बाज भी विभिन्न शासकीय व अशासकीय कार्यालयों में अपने प्रवेश रूपी अधिकार हेतु संघर्षरत है। किन्तु मां समान हिन्दी भाषा को अपना हक मांगने के लिए दफ्तरों व चन्द विधेयक रूपी दस्तावेजों के बीच पिसना पड़ रहा है।

प्रतिवर्ष हिन्दी दिवश के पावन अवसर पर शासकीय आयोजन की औपचारिकता पूर्ण और चुनिन्दा खोखली घोषणाओं व बाह्य आडम्बरों का नंगा नाच होता है। हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाये जाते है, हिन्दी के संपोषण हेतु झूठी कसमें खायी जाती हैं, किन्तु अगले ही पल हिन्दी मां के सेवक होने का दावा करने वाले दुर्जन अपने चंद विलासिता की आकांक्षा पूर्ति हेतु ’’हिन्दी’’ के साथ अजनबी सा व्यवहार करते है। बेचारी हिन्दी जस के तस झुठलाई, ठुकराई अबला की भांति सिसकती रह जाती हैं।

अंधविश्वास व बाह्य आडंबरों के देश भारत में अंग्रेजी भाषा के प्रति दुराग्रह का आलम ये है कि व्यक्ति अंग्रेजी में बात करना अपने उच्च जीवन स्तर का प्रतीक मानता है। अदालत में मामले कि पैरवी से लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों के ठेलों-खोमचों की चर्चा तक अंग्रेजी भाषा का अधिकार है। बेरोजगारी रूपी विदू्रपतापूर्ण सामाजिक समस्या के संक्रामक दौर में विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिन्दी भाषीयों को ऐसे निकाल देते हैं, जैसे दूध में से मक्खी। राष्ट्र निर्माण का भार अपने कंधों पर ढोने वाले शासकीय वेतन भोंगो शिक्षक भी अपने बच्चों का दाखिला भी सर्वसुविधायुक्त निजी विद्यालय रूपी अंग्रेज बनाने की फैक्ट्री में कर देते हैं।

विडम्बनापूर्ण कटु सत्य तो यह है कि राष्ट्र संचालन की नैतिक जवाबदारी लेने वाला शिक्षक ही भाषायी पुूर्वाग्रह ग्रस्त है तो समाज के अन्य तबकों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। हमें चाहिए कि शीघ्रातीशीघ्र हिन्दी भाषा के सन्दर्भ में कलुषित धारणा का त्याग कर सर्वप्रथम इसे व्यवहार की भाषा बनाएं। मातृरूपा हिन्दी को महिमामंडित ेरती चंद पंक्तियां प्रस्तुत है-

हिन्दी है बिन्दी माथे की,सजती हरेक वेष में।
प्रेम का संदेश सिखाती,हर जाती हर देश में।
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