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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



अहं की हार


कमला घटाऔरा


कल उस घर के ऊपर से काल रात्रि गुज़री थी। कोई नई बात नही थी। हर मध्यवर्गीय परिवार का रोज़ का ड्रामा। माँ बेटे की ख़ुसर-फुसर। फिर पत्नी पर पति का गुस्सा निकालना। छोटी छोटी बात को बढ़ा कर बहू पर दोष मढ़ना। बेटे को भड़काना। नित का किस्सा। कल भी यही हुआ था। बेटे ने परोसी हुई थाली दूर फेंक दी थी । अंदर के गुस्से का सिलेंडर फट पड़ा। सब्जी में नमक ज्यादा था।

‘‘यह खाना है या ज़हर ? चार बच्चों की माँ बन गई। खाना भी ठीक से नहीं आया बनाना ? माँ से पूछ कर बनाने में लाज़ आती है क्या ?’’

‘‘नुक़्स क्या है इस में जरा मैं भी तो जानूँ।’’पत्नी का सब्र दम तोड़ चुका था।एक तो पहले ही जल्दी जल्दी रोटी सकते समय भापसे अंगुलियाँ सड़ गयीं थीं।उस पर यह खाने में नुक़्स सुनना।हाथ के साथ रूह भी जैसे जल उठी।

‘‘तू मुझसे ज़बान लड़ाएगी तेरी इतनी हिम्मत ?’’ ..... ‘‘मैं देख रहा हूँ तेरी ज़बान बहुत चलने लगी है।’’

‘‘क्या मुँह पर ताला लगा लूँ ? तुम जो न सो बोलते रहो। तुम्हे तो बच्चों का भी लिहाज नहीं ।’’

इस बात ने जैसे पति के क्रोध की आग पर घी डाल दिया हो। उसने आब देखा न ताब। रसोई से जा कर किरासन तेल की बोतल उठाई और पूरी की पूरी पत्नी के ऊपर उँडेल दी। फिर बदहवाश सा दियासिलाई खोजने लगा। घर में हड़कम्प सा मच गया। बच्चे सहम कर सिसकते हुए कमरे में जा छुपे। माँ के भी पसीने छूटने लगे। माँ कभी बेटे को पीछे धकेलती कभी बहू को।

कोई चारा न देख माँ ने बहू को कमरे में धकेल कर कहा अन्दर से सांकल लगा लो।

माँ को पीछे धकेल क्रोध से अँधा हुआ बेटा हाथ में दिया सिलाई ले द्वार खोलने की कोशिश करने लगा।

‘‘अरे! कोई बचाओ मेरा बेटा क्रोधसे पागल हो रहा है।’’ माँ रोते हुए चिल्लाने लगी। माँ के रुदन की आवाज़ शब्दों से अधिक तेज़ थी।

यह पुकार एक पड़ोसन के कानों में पड़ी तो भागी भागी वहाँ आई। सामने पड़ी बाल्टी से पानी का गिलास भर कर बेटे के सिर पर उंड़ेल दिया। क्रोध के दूध में आया उफ़ान नीचे बैठ गया। बेटे को जैसे बिजली का झटका सा लगा। वह समझ ही न पाया यह क्या हुआ है । किसी अनजान को सामने देख वह शर्मिंदा हुआ वहाँ से हट गया।अपने क्रोध के कारण वह आज बुरी तरह हार चुका था ।

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