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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



पराया दर्द


जनकदेव जनक


जब किस्मत खराब होती है तो कुछ भी हो सकता है. अच्छा व्यक्ति भी सामने वाले को बुरा नजर आने लगता है.गलतफहमी के झंझावत में वह ऐसे फंसता है कि जोर मारने के बाद भी निकल नहीं पाता. उसका सारा आंदोलन धरा का धरा रह जाता है. विपरीत परिस्थितियों में भी कोई बचाने तक नहीं आता. कुछ समय बाद हकीकत जब सामने आती है तब तक आस पास के लोग अपना काम तमाम कर डालते हैं. गलतफहमी के शिकार पीड़ितों को अफसोस के सिवा कुछ हासिल नहीं होता. मेरे एक वाक्य ने बस में बैठी एक युवती को गलतफहमी का शिकार बना दिया. उसके बाद मेरे साथ जो कुछ भी हुआ, उसका जिक्र अभी नहीं, अपने परिचय के बाद करूंगा.

मैं जिस घटना की दास्तान सुनाने जा रहा हैूं, उससे पूर्व आप मेरा परिचय जान लें. कंधे पर लटके कैमरा को देख कर आप तो समझ ही गये होंगे कि मैं कोई फोटोग्राफर हूं. आप सोच रहे होंगे कि मैं इलेक्ट्रिक मीडिया से हूं या प्रिंट मीडिया से या शौकिया फोटोग्राफर ! असमंजस की स्थिति में हैं न आप! आपके झिझक को मैं ही दूर किए देता हूं. मैं कोई शौकिया फोटोग्राफर नहीं, बल्कि प्रिंट मीडिया से जुड़ा एक फोटोग्राफर हूं. इस लंबे-पतले छह फीट के युवक के बाल थोड़े से लंबे हैं, जो आज के आम युवकों से मेल नहीं खाते. उम्र के 25 वें पायदान पर अटका हुआ हूं, नाम है मेरा जॉन जॉनी जनार्दन है. लेकिन लोग मुङो जॉन के नाम से पुकारते हैं. प्रेस की मीटिंग रांची में थी. उसे अडेंट कर अपने शहर लौट रहा था. मैं जिस सीट पर बैठा था, उसकी बाजूवाली सीट पर एक खूब सूरत युवती बैठी हुई थी. बस में सीट से ज्यादा यात्री थे. काफी अस्त व्यस्त माहौल था. सीटों के बीच खाली बचे स्थानों पर भी यात्री खचाखच भरे हुए थे.कंडक्टर उन्हें आगे-पीछे ढकेलते हुए टिकट चेक कर रहा था. जिन यात्रियों का टिकट नहीं हो सका था, उन्हें टिकट काट कर दे रहा था. इसी क्रम में वह मेरे पास पहुंचा और इशारा करते हुए कहा ‘टिकट निकालो.’

‘हिंप पॉकेट में टिकट है, बिना सीट से खड़ा हुए कैसे निकालूं? देखते नहीं कितनी भीड़ है. आप लोग अधिक पैसा कमाने के चक्कर में यात्रियों को भेड़ बकरियों की तरह ठूंसते जा रहे हैं. बस में तिल रखने की जगह नहीं है. ’ मेरी शिकायत पर उसने कोई ध्यान नहीं दिया. उलटे मुङो ही झिड़का,

‘टिकट निकालो मुझे और भी टिकट चेक करने हैं.’ कंडक्टर ने मेरी बातों को अनसुनी करते हुए लापरवाही से कहा और अपनी बातों को मुझ पर लादा.

मैं किसी तरह अपनी सीट से खड़ा हुआ. बमुश्किल दायां हाथ घुमाकर पीछे ले गया और हिप पॉकेट से अपना पर्स निकाला, पर्स में रखे तुड़े मुड़े टिकट को सीधा कर उसे दिखाया. कंडक्टर ने टिकट को थोड़ा सा फाड़ कर मुझे लौटा दिया. टिकट को पर्स रखने के दौरान उसमें रखा हुआ पासपोर्ट साइज का मेरा एक फोटो नीचे गिर पड़ा. उसे उठाने के लिए सीट की ओर झुका, लेकिन संकीर्ण जगह होने की वजह से उसे उठा नहीं सका. बाजूवाली सीट पर युवती के बैठे होने से थोड़ी परेशानी हो रही थी. इसी बीच एक बार पुन: उठाने की कोशिश किया. मेरी अंगुलियों का स्पर्श पाकर फोटो युवती की साड़ी के नीचे सरक गया. जैसे कोई बिल्ली का बच्चा किसी कुत्ते के भय से भाग कर सुरक्षित स्थान पर दुबक गया हो. जब फोटो साड़ी के नीचे चला गया तो मैं कुछ ज्यादा ही मानसिक रूप से परेशान हो गया.

उस वक्त युवती खिड़की से बाहर देख रही थी. उसका मन पीछे छुटते प्राकृतिक दृश्यों के अवलोकन में रमा हुआ था.खेतों में लहलहाती हरी-हरी फसलें उसकी आंखों में खुशी प्रदान कर रही थी. इसी दौरान मैंने उसे हड़बड़ा कर टच किया. साथ ही मेरे मुंह से निकल पड़ा,‘ मैडम, थोड़ा सा साड़ी ऊपर उठाइये न फोटो लेना है.’

घटना बस इतनी सी है. गीता की कसम! पाठकों की अदालत में कभी झूठ नहीं बोलूंगा, जो कुछ कहूंगा सच कहूंगा,सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा.....!’

मेरी जबान से निकले वाक्य को सुनते ही वह युवती आग बबूला हो गई. तुरंत उसकी मासूम आंखें लाल हो गई. नाक भौं चढ़ाती हुई वह विद्युत गति से मेरी ओर लपकी. मेरे जुल्फों को जोर से अपनी मुट्ठी में खींचा और पीटना शुरू किया.

भद्दी भद्दी गालियां बकती हुई मेरी बायीं गाल पर ताबा तोड़ तीन चार थप्पड़ जड़ दिया. पूरे बस में उसकी गालियां एटम बम की तरह गूंजती रहीं.

‘आवारा..कुत्ते की औलाद..बेहाया..साड़ी के नीचे से फोटो लेगा..तुझे छठी का दूध याद न दिला दूं तो फिर मेरा नाम सपना नहीं...’

‘अरेरे.....मेरा मकसद ये नहीं था..जो आप गलत समझ रही हैं..’ मैं युवती को ठीक ढंग से समझा पाता, उसके पूर्व ही एक जाट बीच में टपक पड़ा,

‘मैडम, इसने आपको छेड़ा. आप इसे छोड़िए. इसे हम ठीक करेंगे. ’ उसने दांत पीसते हुए अपने मजबूत पंजों में मुझे टांग लिया. फिर गुर्राते हुए अपने गंजे बेलमूंड का वार मेरे चेहरे पर किया. एक ही वार में नाक से भल-भल खून फेंकने लगा. साथ ही वह बोलते जा रहा था,

‘क्यों बे हीरो बनने का शौक जगा है.... तेरी सारी हेंकड़ी भूला दूंगा......ये...ले....’

उसके साथ ही यात्रियों का हुजूम मेरे ऊपट टूट पड़ा. वे मेरी पिटाई कर युवती के प्रति सहानुभूति जताने लगे. उनके लिए मेरा पीठ चमड़े की ढोल बन गया था. मुझे लगा आकाश में मंडराते गिद्धों की नजर किसी मरे हुए जानवर की लाश पर पड़ गई है, जो बड़े-बड़े डैने फैलाते हुए जमीन पर उतर आ़ए हैं और अपने अपने हिस्से का मांस नोंच रहे हैं.वे जब तक चोंच मारेंगे,जब तक शरीर कंकाल नहीं बन जायेगा!

इस घटना से क्षबुध कुछ महिलाओं में भी चर्चा गर्म थी. वे अपना-अपना भड़ांस निकालने में व्यस्त थी. पीड़िता सपना से अपनापन जताते हुए एक महिला बोली, ‘पुरूष वक्त बेवक्त हमें अपना शिकार बनाते रहते हैं. दामिनी हत्या कांड में मिले आरोपियों को फांसी की सजा से सबक नहीं लिया. ये महिलाखोर बन गए हैं. इन्हें गोश्त खाने की लत पड़ गई है.सूखी हड्डियां भी चूसने से बाज नहीं आते. ’

तभी दूसरी महिला पुरुषों के समर्थन में बोल पड़ी, ‘ एक आदमी दोषी है तो सभी मर्दों को गाली देने से क्या फायदा.सभी दुष्कर्मी नहीं होते हैं!’

तीसरी बोल पड़ी,‘ आपकी बातें सौ फिसदी सही है. लेकिन क्या घर की चहार दीवारी के अंदर बंद हमारी मेहर-बेटियां सुरक्षित हैं? सबसे ज्यादा यौन शोषण तो हमारे रिश्तों में ही होता है. लेकिन लोक लाज और मर्यादा हनन का हवाला देकर उसे घर में ही दबा दिया जाता है. राह चलती लड़की हो या सफर करती महिला यात्री, ऑफिस में काम करने वाली नवयौवना हो या घरेलू काम करने वाली दाई. पुरूष सभी को भोग की वस्तु समझता है. उसे मालूम है कि औरत के कई रूप होते हैं, बावजूद सबको प्रेयसी के रूप में ही देखता है. चाहे गोरी चमड़ी वाली हो या काली कलूटी, कोई फर्क नहीं पड़ता. उनको स्त्री सौंदर्य से ज्यादा उसका सुडौल देह पसंद है.’

दूसरी फिर बोल उठी, ‘मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूं. आज की फैशन परस्त लड़कियों को देखो. ऐसे ऐसे उत्तेजक कपड़े पहनती हैं कि देखने वाला शर्म से अपनी आंखें चुरा ले. उनके पहनावे में अंग अंग झलकता है. पुरूषों की बात तो दीगर है, उनके बदन पर बरबस महिलाओं की नजरें भी ठहर जाती हैं.’

तीसरी महिला आक्रोशित होती हुई बोली, ‘ तुम सठिया गई हो. इसलिए अनाप शनाप बोल रही हो. ऐसे पौराणिक विचारों को किसी जादू घर में सहेज कर रखवा दो, तुम्हारे आनेवाली पीढ़ी के काम आएंगी. ’

बस में जितनी महिलाएं थी, उतनी तरह की चर्चाएं हो रही थी. कई महिलाएं तो स्त्री-पुरूष विमर्श पर जोरदार बहस में फंसी हुई थीं. एक कहावत है कि बंदूक से निकली गोली और जबान से निकली बोली कभी वापस नहीं होती. छुटती है तो सामने वाले का सीना चीर कर पार हो जाती है. उसकी तड़प तो मौत से भी ज्यादा असहनीय होती है. अगर किसी से तमीज से बात कर लो तो वह खुशी में बनारसी या मगहिया पान खिला कर लबों को लाल कर देता है. यदि यही जुबान फिसल गई तो लात -जूतों की बरसात भी हो जाती है.

बढ़ते हंगामा को देखते ही बस चालक के प्राण सूख गए. उसे लगा कि ज्यादा बात बिगड़ी तो उग्र भीड़ बस में आग भी लगा सकती है. आज के बदले परिवेश में छेड़खानी करना, सीटी बजाना ,फब्तियां कसना जुर्म हो गया है. ऐसे मामलों पर जनता भी पहले से ज्यादा निर्भीक व जागरूक हो गयी है. अच्छा रहेगा कि बस को वह किसी थाना के परिसर में लगा दे. यह सोचते हुए उसने पास के एक पुलिस स्टेशन में अपनी बस को खड़ा कर दिया. बस खड़ा होते ही चालक अपनी सीट से नीचे कूदा और भागता हुआ थानेदार राम भरोसे के पास पहुंचा.

‘ अबे कुत्ते की माफिक क्यों हाफ रहा है, कुछ कहना है तो जल्दी बको....’

‘साहेब.....मेरे बस में एक लड़की के साथ किसी ने छेड़खानी ..’

‘छेड़खानी..’ दरोगा आंखें तरेरते हुए चालक को खा जाने वाली नजरों से घूरा.

‘ हां..हां.हां ..साब..आप ठीक समङो..’ चालक हकलाया.

‘छेड़खानी में जरूर तेरा खलासी या कंडक्टर होगा.... और तुम स्याले भाग आये हो निर्दोष बनने के लिए..’

‘नहीं साब..हाथ जोड़ता हूं,..आप गलत समझ रहे हैं..’ चालक हाथ जोड़ते हुए गिड़गिड़ाया.

‘जगन सिंह इस सिरफिरे ड्राइवर को हाजत में डालो.’ थानेदार अपने कांस्टेबल से बोला और हाथ में डंडा लहराते हुए बस की ओर निकल पड़ा. उसके पीछे पीछे दो सिपाही और थे.

पुलिस स्टेशन परिसर में बस के रूकते ही यात्री मुझे खींच कर बाहर लाए. थानेदार को देखते ही उत्साह में मेरी पिटाई और तेज कर दी, जैसे बिगड़ैल छोकड़ों को सुधारने का ठेका वहीं लोग ले रखे हों.

‘ अच्छा हुआ, आप लोगों ने मेरा काम हल्का कर दिया. अब इस मजनूं को मेरे हवाले कर दीजिए. थाने में ले जाकर इसकी खबर लूंगा. ’ थानेदार ने लोगों को हटाते हुए मेरे पास पहुंचा और मेरे लंबे-लंबे बालों को पकड़ता हुआ जोर से अपनी ओर खींचा. उसके बाद चूतड़ पर एक लात जमाते हुए सिपाहियों की ओर ढकेल दिया. फिर उसने जोर से आवाज लगाई,

‘अरे भाइयों, पीड़िता कहीं दिखाई नहीं पड़ रही है. इन बादमाशों ने उसे कहीं मार तो नहीं डाला..?’

‘ लड़की सुरक्षित है सर..अपनी सीट पर बैठी रो रही है..’ कई लोग एक साथ बोल उठे. ‘ आइए सर ..,देखिए ..वो ..रही पीड़िता..’

बस के दरवाजे पर खड़े थानेदार को देखते ही युवती हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई. अचानक उठने से उसका बैग नीचे गिर गया. वह अपने पैरों के नीच की साड़ी को थोड़ा ऊपर समेटते हुए बैग उठाने के लिए झुकी. तभी सीट के नीचे पिटाई खा रहे युवक का हंसता हुआ फोटो दिखाई पड़ा. युवती ने उसे अनमने ढंग से उठा तो लिया. लेकिन मारे भय के उसका हाथ पांव फूल गया. उसका सारा गुस्सा क्षण भर में काफूर हो गया. वह असमंजस की स्थिति में जस की तस खड़ी रह गई. थानेदार युवती के हाथ से फोटो झटक लिया. फोटो का चेहरा पहचाने ही उसने विस्मित नेत्रों से युवती को देखा और पूछा,

‘ किसका फोटो है? ..अरे बोलती क्यों नहीं ..आया समझ में..एक तरफ पिटाई और दूसरे तरफ उसकी तस्वीर निहार रही हो !..छी... छी..’ :---:

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