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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



समझ नहीं आये...


विश्वंबर व्यग्र


सावन आया चला गया कब,
कोई बतलाये !
ना झींगर की रटन सुनी
ना मेंढ़क टर्राये
मेघा उड़े ना आसमान में
ना बादल छाये
गर्जन तर्जन हुआ ना
ना भीग के घर आये
ना श्रंगार किया तालाब ने
ना दगड़े बौराये
ना टपकी टपरिया मेरी
ना खेत लहलहाये
मयूर के मौनव्रत को,
कैसे तुड़वायें 
ये कैसी पावस-ऋतु थी,
समझ नहीं आये...
 
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