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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



हम चलें तदबीर से!


डॉ० अनिल चड्डा


हम चलें तदबीर से, तकदीर करती अपना काम,
कौन जाने कब यहाँ हो जाये इस जीवन की शाम।

राह तो पकड़ी थी हमने, ले जाये जो मन्ज़िल की ओर,
रास्ता भी दास्ताँ कहने लगा अपनी कुछ और,
सुनते-सुनाते दास्ताँ हम आ गये कुछ और मुकाम।
हम चलें तदबीर से, तकदीर करती अपना काम,
कौन जाने कब यहाँ हो जाये इस जीवन की शाम।

दिल कहे तू मान मेरी, अक्ल थी कहती कुछ और,
दिल की मानें, चोट खायें, पहुचें जाने किस ठौर,
दिल तो करता है शरारत, अक्ल चुकाती सारे दाम।
हम चलें तदबीर से, तकदीर करती अपना काम,
कौन जाने कब यहाँ हो जाये इस जीवन की शाम।

वक्त ने पूछा कभी न, हमसे कितना वक्त है,
वो है चलता राह अपनी, चुस्त चाहे पस्त है,
तेरी खातिर न रुके वो, करता चल तू अपना काम।
हम चलें तदबीर से, तकदीर करती अपना काम,
कौन जाने कब यहाँ हो जाये इस जीवन की शाम।
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