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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



दर्द से जुदा कोई बंदा नहीं!


डॉ० अनिल चड्डा


दर्द से जुदा कोई, है यहाँ बन्दा नहीं,
तेरा दर्द ही यहाँ, दुनिया से तीखा नहीं।

चोट खाये बैठे हैं, अपनों से कितने यहाँ,
भावना के हाथों से, फिर भी हैं बिकते यहाँ,
दास्ताँ किससे कहें, कोई भी बचा नहीं।
दर्द से जुदा कोई, है यहाँ बन्दा नहीं,
तेरा दर्द ही यहाँ, दुनिया से तीखा नहीं।

आईने भी आजकल, झूठ हैं कहने लगे,
अक्स अपने से कहो, बात फिर कैसे करें।
आईना बोले जो सच, वो कभी दिखता नहीं।
दर्द से जुदा कोई, है यहाँ बन्दा नहीं,
तेरा दर्द ही यहाँ, दुनिया से तीखा नहीं।

कौन मिलता है यहाँ, साफगोई औ” दिल-साफ से,
उल्लू सीधा करते हैं सभी, अपनी ही हर बात से,
लेना सीखा है, कभी कुछ देना तो सीखा नहीं।
दर्द से जुदा कोई, है यहाँ बन्दा नहीं,
तेरा दर्द ही यहाँ, दुनिया से तीखा नहीं।
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