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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



रूठकर क्यूं हमसें जाने लगे


ललित प्रताप सिंह


रूठकर क्यूं हमसें जाने लगे,
बेवजह क्यूं हमें सताने लगे!

माना जीवन कठिन हैं बहुत
तुम इसको और बनाने लगे!

हर पल की खबर तुमको मेरे
खुद को ही अंजान बताने लगे!

कश्ती डूब रही मेरी दरिया में,
तुम इसको और भी डुबाने लगे!

है कोई खता अगर मुझसे हुयी,
तुम उसको भी अब छुपाने लगे!

समझेगा कहा कोई मेरी यहां,
सब तुम्हारी ओर ही आने लगे!

नाम करना ना बदनाम मेरा कभी,
हम खुद की पहचान छुपाने लगे!

है बातें जो करनी तुमसे अभी
उनकी लिस्ट अभी से बनाने लगे!

होगी मुलाकात अकेलें में कभी,
सोचकर शहर तेरे रोज जाने लगे!

तेरी यादों मे कुछ हम ऐसे खोये,
कि सुबह शाम नगमा बनाने लगे!

करें ना कोई तुझसे मसकरी यहां,
इसलिये हक अपना जताने लगे!

'ललित'पर तो मरने लगे है बथेरे,
मगर हम तुझ पर जान लुटाने लगे!
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