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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



ज़बान का जो खरा नहीं है!


धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"


ज़बान का जो खरा नहीं है!
यकीन उसपे ज़रा नहीं है!!

लगे असंभव उसे हराना!
वो आंधियों से डरा नहीं है!!

समझ सके ना किसी की' पीड़ा!
के' ज़ख्म जिनका हरा नहीं है!!

लहू हमारा लो' पी रहा वो!
गुनाह से दिल भरा नहीं है!!

रहे मुसाफ़िर सदा शिखर पे!
ज़मीर जिसका मरा नहीं है!!
            
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