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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



मैंने क्या गुनाह किया


डॉ० अनिल चड्डा


ज़माने ने की उल्फत, मैंने क्या गुनाह किया,
किसी के वास्ते, खुद को था बर्बाद किया।

वो बनें न बनें शरीक-ए-हयात, परवाह नहीं,
हमने तो दर पे उनके सजदा बेहिसाब किया।

यूँ तो सभी से बेलगाम करते-फिरते हैं गुफ्तगू,
हमसे ही दिल की कहने से क्यों हिजाब*  किया।

घर मेरा ही क्यों उजड़ा था तेरी बेरुखी से,
बाकी शहर पर तो तुमने अब्रेबहार**  किया।

जो कह नहीं पाये थे हम तेरे रूबरू हो कर,
उन्ही बातों को अपनी कलम का अल्फाज किया।

*हिजाब -   संकोच 
**अब्रेबहार – वसंत ऋतू का मेघ
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