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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



मज़ा उसी में आने लगा


डॉ० अनिल चड्डा


बेवफाई इतनी मिली, मज़ा उसी में आने लगा,
या ख़ुदा किस बात के लिये तूने मुझे पैदा किया।

हंसते हुए, रोते हुए, दुनिया के संग चलना पड़ा,
दिल काट के कोई देखता, इसमें क्या था भरा।

रातें सभी की आती हैं, न चैन दिन में भी मिला,
कुछ माँगा था संसार से, क्या है मेरी ये खता।

जितना कटेगा रास्ता, हंस-हँस के काटेगा अनिल,
शिकवों-गिलो से क्या मिले, सब बीत जाता है समां।
 
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