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वर्ष: 2, अंक 20, सितम्बर(प्रथम), 2017



बारिश आई


डॉ० अनिल चड्डा


 
आओ – आओ बारिश आई,
संग - संग ठंडी हवा भी लाई,
तुम भी भीगो, हम भी भीगें,
हो जाये हम सब की धुलाई ।

कागज की छोटी नाँव बनाएँ,
फिर बहते पानी में बहाएँ,
डूबे न भारी बूँदों से,
हाथों की छतरी आओ बनाएँ।

जहाँ भी थोड़ा पानी देखा,
नाँव ने रूख वहीं का देखा,
बहती जाये, लुढ़कती जाये,
पत्थर - कंकर कर अनदेखा ।

बारिश की बौछार है भारी,
बढ़ती जाये नन्ही सवारी,
देखो कितनी हिम्मत वाली,
छोटी सी ये नाँव हमारी।

आओ कुछ हम सीखें इस से,
कभी रुके न किसी भी डर से,
बढ़ते जायें, कदम उठाये,
छुटे न मंजिल कभी भी हम से।
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