Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



असली पागल कौन है


सुदर्शन कुमार सोनी


पागल खाने मे आंदोलन हो गया था। यह यहां की अव्यवस्था के प्रति रोष जताने का संघर्ष था , पागलों ने जतन से जबरदस्त तोड़फोड़ करी थी । डाक्टर व सुरक्षाकर्मी बुला लिये गये थे । लेकिन पागलों ने दोनो की भी तबियत से धुनाई करके अधमरा कर दिया था। डाॅक्टर पर वे सबसे ज्यादा को्रधित थे कि ये ही वो पगला षख्स है जो अपनी नौकरी बचाये रखने हमें पागल घोषित करता है , इससे बडा़ पागल यहां कोई दूसरा नही है ! पागलां ने पता नही कंहा से एक माईक जुगाड़ लिया था। एक टेंट लगाकर कुछ पागल अनषन पर भी बैठ गये थे। एैसें में गैर पागलों का पागलपन खत्म होकर समझ मे आया कि पागलों को अब सुनना जरूरी है । जरूर हमने इनका सही इलाज किया है , इसलिये कई सामान्य अवस्था मे आ गये है। ऐसा नही होता तो भला पागल भी हम गैर पागलो की तरह अनषन कर पाते क्या !

एक गैर पागल ने कहा कि साहब यह तो देष के माहोल का असर है यहां हर बाsत मे बिना अनषन कुछ होता नही है हम भी सीख गये है ? जब हड़ताल व अनषन नही रूका ,पागलो की तोड़फोड़ नही रूकी तो सरकार ने एक पांच सदस्यीय कमेटी उनकी बातो को सुनने के लिये गठित कर दी। पागलों की मांग के अनुसार ही इसमे एक पागल को भी सदस्य बना दिया गया। पागलों ने अपना अनशन झट स्थगित कर दिया ।

सुनवायी पा्ररंभ हुयी । पागलो ने अच्छी तैयारी करके रखी थी ! एैसी कि लगने लगा कि ये पागल नही है , असली पागल तो अपने को सामान्य समझने वाले है । पागलों ने अपने मे से एक कम्पयूटर जानकार को पावर प्वांईट पे्रजेन्टेषन के माध्यम से अपनी बात अच्छे से गैर पागलों लेकिन उनकी नजर मे महापागलो पर रखने के लिये तैयार कर लिया था।

नियत समय को कमेटी पागलो की समस्याओ को सुनने के लिये पागलखाने मे उपस्थित हो गयी । पागलो ने निम्न मांगे रखी ।

पहली कि सबसे पहले उनकी मेडिकल जांच करके पागल घोषित करने वाले डाक्टर को पागल घोषित किया जाये । पागल कौन है इसका निर्धारण नये सिरे से किया जाये , पागल कौन है ? हम जो सींखचो के भीतर है या कि आप जो कि बाहर है ! उन्होने एक के बाद एक कई ठोस दलीले भी इस संबंध मे दी।

असली महापागल आप हैं , हमें पागल नही आप अर्ध पागल कह सकते हो उदाहरण हजारो है , आप जब कोई मृत हो जाता है तो , उसको पूजना षुरू कर देते हो और वही आदमी जब जीवित रहता है , तो उसे अपमानित करते हो जेल मे डाल देते हो ! एक लेखक की किताब पर प्रतिबंध लगा देते हो , उसका जीना हराम कर देते हो , लेकिन वही जब इस दुनिया से कूच कर जाता है तो उसको आप अमर कर देते हो ! तो असली पागल आप है हम नही हम एैसा नही करते। साईंबाबा , कबीर , रैदास , निजामुददीन औलिया सब अपने समय मे दरिद्रता से भरपूर जीवन व्यतीत करते थे । लेकिन आज आप उनको मंहगे आभूषण सोना चांदी , चोला चढा़ते हो जबकि वे इसका उपयोग करने आज हैं नही ! यह पागलपन नही है तो फिर क्या है , जरा बताये पागलों की जमात !

पगले आप हैं , हम नही , मंदिर मस्जिद बनाने के लिये पलक झपकते लाखो रूपये का चंदा कर लेते हो लेकिन वहीं स्कूल , अस्पताल रूपी षिक्षा व स्वास्थ्य के मंदिर जो भवन विहीन है , फर्नीचर नही है इसके लिये अंटी आप ढीली नही करते ।

हमारे यहां कोई लिंग भेद नही होता , आपने कभी पढा़ सुना है कि पागल ने किसी का बलात्कार कर दिया । बल्कि विक्षिप्त तक का रेप आप गैर पागल व्यक्ति करने से बाज नही आते। तो अब आप बताओ कि असली पागल कौन है हम कि आप ! हम तो यह कहते है कि आप पूर्ण विक्षिप्त लोग हो !

आपने न जाने कितने भगवान बना कर रखे है काले आदमी का भगवान काला व गोरे का गोरा बना कर रखा है। एैसा कभी होता है क्या ? अब इससे बडा़ पागलपन क्या हो सकता है ? भगवान मे भी रंगभेद नीति ! वाह भाई आप पागलों से बचे कोई !

रोज एक बाबा , साधु , योगी यहां व्यभिचार , गैर कानूनी कामों मे गिरफ्तार होता है। लेकिन वाह रे पगलो उसके बाद भी तुम्हारा आस्था का पागलपन खत्म नही होता है , उनकी जगह नये ढोंगी बाबा , साधु महाराज , रातोरात अवतरित हो जाते है और अपने को सामान्य समझने वाले फिर से पागलों की तरह इनके प्रवचनो मे , उपदेशों को सुनकर झूमने लगते है।

हर चीज की हद की तरह पागलपन की भी एक हद होना चाहिये ? लेकिन आप कंहा मानते हैं । रोज कोई न कोई कंपनी आपका पैसा सोना दुगना करने का लालच देकर आप को लूट लेती है लेकिन आपकी इनके पीछे पागलपन की हद तक दीवानगी खत्म नही होती । एक दिन रातोरात अपना बोरिया बिस्तर समेट कर रफू चक्कर हो जाते है। फिर कोई दूसरा ठग अपनी दुकान खोल लेता है और यहां नही आप ही भीड़ लगाते हैं ? अब भी षक है कि असली पागल कौन है ?

हम एक अलग तल पर जीने वाले लोग हैं , पगले नही । आप यदि पागल नही होते तो हमे समझ पाते , लेकिन चूंकि आप पागल हो इसलिये हमे नही समझ पाये । आप पूरे पागल हो इसके लिये एक ही उदाहरण काफी है। हर पांच साल मे आपको बेवकूफ़ व्यवस्था सुधार के नाम पर बनाया जाता है। जो कभी सुधरती नही है और सच्ची के पागलों आप भी नही सुधरते हो , बार बार बहकावे मे आ जाते हो ।

ये तो हमारी दलीले हुयी अब हमारी मांगे ये है ।

चूंकि हम एक अलग तल पर रहने वाले लोग है , और पागल होते हुये अपने को सामान्य समझने वाले आप लोगो की सोच पीछे की है तो हमारी आपसे पटरी बैठ नही पायेगी। हमारे बारे मे जो भी नीति बनायी जाये उसमे हमारा पर्याप्त प्रतिनिधित्व किया जाये । हमारे कांऊसलर व डाॅक्टर की अच्छे से जांच कर ली जाये पागलट झकलट टाईप हमारे साथ न लगाये। नही तो ये हमें भी अपनी तरह का पूरा पागल ही करके चैन लेंगे।

हमसे आप जियो और जीने दो सीख सकते है ? हम किसी का निवाला छीनते नही है , बल्कि यदि हमारी थाली मे दो रोटी है तो एक ही नही दोनों हम दूसरो को दे देते है और सामने वाला यदि इसका अनादर करे तो उसकी तबियत से धुनाई कर सकते है।

जैसे कि बहुत तेज या बहुत धीमी आवाज सामान्य मनुष्य को सुनायी नही देती है वैसे ही हमारा कला , साहित्य सामान्य मनुष्यो के पल्ले नही पड़ता है तो हमारी मांग है कि एैसे एक्सपर्ट खोजे जाये तो इसे गा्रस्प कर सके! हमारे यहां सब तरह का साहित्य लबालब भरा पडा़ है। जानने बूझने वालों की जगह भर रिक्त है।

www.000webhost.com