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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



मेरी शिकायत यह है कि...


प्रो. राजेश कुमार


रवि ने प्रशिक्षण विभाग को यह शिकायत लिखित रूप में की कि उनकी प्रशिक्षण की प्रक्रिया में बहुत कमियाँ हैं और उन्हें ऐसी बहुत-सी बातें सिखाई जाती हैं, जिनका व्यवहार मे कोई इस्तेमाल नहीं है तथा ऐसी बहुत-सी ज़रूरी बातें छोड़ दी जाती हैं, जिनका रोज़मर्रा के कामकाज में सामना होता है। अतः पूरे प्रशिक्षण-कार्यक्रम पर नए सिरे से विचार करके उसमें यथोचित संशोधन किए जाने चाहिए, ताकि प्रशिक्षण-प्राप्त लोगों को काम करने और अच्छी आउटपुट देने में सुविधा हो।

ऐसा क्या हुआ, जिसके कारण रवि को यह शिकायत लिखित रूप में प्रशिक्षण विभाग को करनी पड़ी?

रवि विदेश सेवा का अधिकारी था और सेवा के पहले साल में उसने स्थानीय विदेशी भाषा सीखी और फिर द्वितीय सचिव के पद पर काम करने लगा। अपने कामकाज में उसके साथ शुरू से ही ऐसी घटनाएँ घट रही थीं, जिनसे उसे असुविधा हो रही थी।

विदेश सेवा अधिकारी को मासिक तौर पर एक रिप्रजेंटेशन ग्रांट (संक्षेप में आर.जी., हिंदी में प्रतिनिधित्व अनुदान) मिलती है, जिसे वह ऐसी मदों पर ख़र्च कर सकता है, जो देश के प्रतिनिधि के रूप में उसे करने पड़ सकते हैं। जैसे – विदेशियों को दावत देना, विज़िटिंग कार्ड छपवाना, आदि। रवि अकसर इस पूरी राशि को ख़र्च नहीं कर पाता था और महीने के आखिर में कुछ-न-कुछ राशि लैप्स हो जाती थी। एक दिन उसके सहायक ने उसे आकर कहा कि उसका आर.जी. का बिल नहीं आया।

"मेरा इस महीने कुछ ख़र्चा ही नहीं हुआ।" रवि ने बताया।

सहायक की समझ में कुछ नहीं आया। "जी, वो तो ठीक है, पर आपका बिल नहीं आया।" उसने कुछ समझने और कुछ समझाने की प्रक्रिया में कहा।

"क्या मतलब, जब ख़र्चा नहीं हुआ, तो बिल कैसा?" रवि को सहायक की बुद्धि पर तरस आया।

अब सहायक को समझ आ गया कि माजरा क्या है और यह भी कि रवि को ज्ञान-दान की ज़रूरत है। अच्छे और मददगार सहायक की भूमिका निभाते हुए उसने यह ज़िम्मेदारी खुद पर ले ली और रवि को खुले शब्दों में समझाया कि इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि महीने में आर.जी. के खाते में उसका कुछ ख़र्च हुआ है या नहीं। वह दोनों ही स्थितियों में अपना बिल दे सकता है, क्योंकि सरकार ने यह राशि उसके लिए रखी है और उसे छोड़ना मूर्खता ही होगी। उसने यह भी कहा कि यदि उसे बिल बनाने में कुछ परेशानी है, तो वह इसमें भी सक्रिय सहयोग कर सकता है। उसने यह भी जोड़ा कि इसमें कोई ग़लत-सही का प्रश्न भी नहीं है, क्योंकि सभी अधिकारी ऐसा ही करते हैं और यह भी कि इसमें डरने की ज़रूरत भी नहीं है, क्योंकि सब जानते हैं कि अधिकारी ऐसा करते हैं। तथापि, अगर आपने हर बार आर.जी. का दावा पेश नहीं किया, तो उस स्थिति में ज़रूर डरने की बात ज़रूर होगी, क्योंकि तब कोई भी आसानी से यह साबित कर सकेगा कि विदेशियों के साथ राह-रस्म पैदा करने का अपना काम आप ठीक ढंग से काम नहीं कर रहे हैं जिसके लिए सरकार ने आपको नियुक्त किया है।

यह पहली महत्वपूर्ण बात थी, जो रवि को प्रशिक्षण के दौरान नहीं सिखाई गई थी। उसे पसीने आ गए। उसकी इच्छा हुई कि सहायक के चरण-स्पर्श कर ले।

एक बार रवि ने अपने सहायक को दो सौ डॉलर यह कहकर देने चाहे कि लेखा विभाग में जमा करवा दे, क्योंकि उसने इतने पैसे के निजी फ़ोन किए हैं।

"इसकी ज़रूरत नहीं है, सर!" सहायक ने बताया।

"क्यों?" रवि को आश्चर्य हुआ।

"मैंने पहले ही प्रमाणित कर दिया है कि सभी कॉलें कार्यालय-सबंधी थीं।" सहायक ने सूचना दी।

"मुझसे बिना पूछे!" रवि को क्रोध आ गया, "उसमें बहुत-सी कॉलें निजी थीं।"

"जी, मैं जानता हूँ। पर यही चलन है।" सहायक ने कहा, "आपके पास पैसे फ़ालतू हैं, तो मझे दे दीजिए, पर उन्हें बर्बाद क्यों करते हैं!" सहायक ने परिवेश को थोड़ा हल्का करने के लिए मज़ाक किया।

रवि की समझ में नहीं आया कि वह सहायक के मज़ाक पर उसे डाँटें या हँसे। वह किंकर्तव्यविमूढ़ बैठा रहा।

"सर, अगर आपने पैसे जमा करवा दिए, तो खलबली मच जाएगी, क्योंकि फिर सब लोगों को पैसे जमा करवाने पड़ेंगे और ऐसा कोई भी नहीं चाहेगा।"

सहायक ने उसे असमंजस्ता की स्थिति से उबारने की कोशिश की।

यह एक और बड़ी बात थी, जिसके बारे में प्रशिक्षण के दौरान संकेत तक नहीं दिया गया था।

रवि को नए-नए अनुभव हो रहे थे और और उसकी बुद्धि चक्कर खा रही थी। उसके सारे संस्कार, उसकी सारी शिक्षा, उसके सारे आदर्श व्यवहार की कठोर चट्टान से टकराकर लहुलुहान हुए जा रहे थे और वह कुछ नहीं कर पा रहा था। उसे कभी-कभी बहुत घुटन महसूस होती थी। वह चाहता था कि सब कुछ छोड़-छाड़कर कहीं भाग जाए।

एक दिन वह अपने सहायक को चिट्ठियाँ वगैरह डिक्टेट कर रहा था, तो अचानक मौका देखकर सहायक ने कहा, "सर, आप बहुत दिनों से टूर पर नहीं गए।"

अब तक रवि अपने सहायक से खुल चुका था और उसकी योग्यता के सम्मुख नतमस्तक था। इसके अलावा उसे सिखाया गया था कि दफ़्तर के माहौल को हल्के-फुल्के मज़ाक आदि से ख़ुशगवार रखा जाना चाहिए, इसलिए उसने कहा, "क्यों, क्या तुम्हें मेरा दफ़्तर में रहना पसंद नहीं है?"

सहायक मुस्करा दिया। बोला, "नहीं, वो बात नहीं है, सर! पर आपको टूर करते रहना चाहिए। इससे टी.ए. डी.ए. बनता रहता है।"

रवि को यह बात पसंद नहीं आई। उसकी समझ मे टूर किसी काम के लिए किया जाता था, टी.ए. डी.ए. के लिए नहीं। पर उसने एक बात तय कर ली थी कि वह सहायक की नज़रों में और अधिक मूर्ख नहीं बनेगा। इसलिए वह चुप रहा। सहायक भी चुप था। दोनों को समझ नहीं आ रहा था कि गतिरोध दूर कैसे किया जाए।

रवि ने ही सफ़ाई जैसी देते हुए कहा, "भई, कोई टूर का प्रस्ताव आएगा, तभी तो टूर पर जाऊँगा!" रवि चाहता तो नहीं था, लेकिन अपने चाहने से भला कभी कुछ हुआ है इस दुनिया में! अपने इस कथन से वह सहायक की नज़रों में फिर मूर्ख बना।

सहायक कुछ देर तो उसके चेहरे की ओर देखता हुआ कुछ भाँपता-सा रहा। फिर ज्ञान-दान की मुद्रा में बोला, "सर, टूर के प्रस्ताव तो आते नहीं, मँगवाए जाते हैं।"

"क्या मतलब?" रवि की समझ में कुछ नहीं आया।

"आप नहीं कहना चाहते, तो मैं फ़ोन कर देता हूँ।" सहायक ने फिर अपनी उदार सेवाएँ पेश कीं, "आप तो बस यह बताइए कि किस शहर में जाना चाहते हैं, मैं प्रस्ताव मँगवा लूँगा।"

रवि फिर चारों खाने चित पड़ा था। उसे प्रशिक्षण-कार्यक्रम की व्यर्थता नज़र आने लगी थी और यह लगने लगा था कि वहाँ के सारे अनुभवी और उच्च पदासीन प्रशिक्षक इस सहायक के सम्मुख बिल्कुल नौसीखिए हैं।

और फिर वह घटना हुई, जिसके बाद रवि ने लिखित रूप में शिकायत की और लिखा कि कि प्रशिक्षण-कार्यक्रम में आमूल-चूल परिवर्तन किए जाए की ज़रूरत है और प्रशिक्षण के काम के लिए कुछ अनुभवी लोगों को भी लिया जाना चाहिए। इस अंतिम सुझाव के द्वारा वह अपने सहायक की ओर संकेत करना चाहता था।

दूतावास के अंग के रूप में एक सांस्कृतिक केंद्र भी काम करता था। कुछ दिन के लिए केंद्र के निदेशक अवकाश पर चले गए और रवि को अस्थायी तौर पर निदेशक का कार्यभार दे दिया गया। वहाँ काम का पहला ही दिन था। सुबह का समय तो कर्मचारियों के परिचय में ही निकल गया। दोपहर में वह जब भोजन करने के लिए सोच-विचार कर रहा था, तो दरवाज़ा खुला और केंद्र में कार्यरत स्थानीय युवा सहायिका ने कमरे में प्रवेश किया। उसने दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी तथा इससे पहले की रवि अपने अचरज से बाहर निकलकर इस सबका सबब पूछता, सहायिका सोफ़े पर लेट गई और उसने अपनी स्कर्ट नीचे की ओर खिसका दी।

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