Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017






  प्रतिक्रिया-

  साहित्यासुधा ई-पत्रिका के अक्टूबर (प्रथम) अंक में आनंद दास द्वारा लिखित विश्व हिन्दी सम्मलेन और हिंदी भाषा के बारे में सक्षिप्त टिपण्णी प्रस्तुत है:-

  लेख बहुत सुंदर और ज्ञानपूर्ण है|

  हिंदी की सेवा, कर्म द्वारा की जा सकती है| उसके लिए गुण-गान करने से अधिक फायदा नहीं होता| कभी-कभी उससे नुक्सान भी होता है|

  हिंदी में जैसे लिखा जाता है वैसा पढ़ा जाता है – दक्षिण भारत के हम लोग ऐसा नहीं मानते – उदाहरण के लिए – “राम दाल भात खाता है “ और पढ़ते है – “राम् दाल् भात् खाता है”|

  जब हम विदेशी छात्रों को बताते हैं कि हिंदी वैज्ञानिक भाषा है, तो विदेशी छात्र पूछते हैं, इस वाक्य को वैज्ञानिक कैसे कह सकते है-

  “वह आ गया है|” इस वाक्य में - वह आया है या गया है?

  एक और बात – दाड़ी- मूंछ के संबंध पुरुषों से है, पर स्त्रीलिंग क्यों है और ब्लाउस और पेटीकोट का संबंध स्त्री से है, यह पुल्लिंग क्यों है?

  क्षमा कीजिए छोटी मुँह बड़ी बात होगी – भाषा , सरल या कठिन कहना मुश्किल है, यह सीखनेवाले और पढ़ानेवाले पर भी निर्भर होता है| जितनी ऊर्जा हम हिंदी की गुण-गान में और बुराई करने में कर रहे है उतनी ऊर्जा यदि हम हिंदी को सरल और अधिकार प्राप्त करने के तारीखे ढूंढें तो बेहतर है|

  इसमें कुछ त्रुटी हो तो माफ़ी|

   डॉ. श्रीलता सुरेश
  बेंगलूरु, कर्नाटक



  डॉ०श्रीलता जी,

  हरेक भाषा की अपनी व्याकरण, अपने नियम और खूबसूरती है जिसे वही समझ सकता है जो उसे जानता है| कोई और नहीं| यदि हम इसकी तुलना अंग्रेजी से करें तो वह दोनों भाषाओँ के साथ अन्याय होगा| इसलिये, प्रत्येक भाषा का अपना अलग अस्तित्व है|

  हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है, इसलिये हमें इसका न केवल सम्मान करना चाहिये बल्कि इससे प्रेम भी| परन्तु दुःख की बात है कि अभी भी अधिकतर लोग विदेशी भाषा होते हुए भी अंग्रेजी से ही अधिक प्रेम करते हैं | सहित्यसुधा प्रकाशित करने का मेरा ये ही उद्देश्य था कि हिंदी के प्रति लोगों का प्रेम जागृत किया जाये|

  डॉ० अनिल चड्डा
  सम्पादक
  साहित्यासुधा

www.000webhost.com



कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें