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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



क्या गरीबों की जिन्दगी सस्ती होती है


अंकित भोई 'अद्वितीय'


21वीं सदी में विकास व प्रतिस्पर्द्धा के चर्मोत्कर्षकाल में मानवता अपने अस्तित्व की रक्षा हेतु संघर्षरत है। नेता मंत्री रूपी समाज सेवक लोकहित का राग तो अलापते हैं किन्तु सम्बंधित योजनाएँ कागजों में ही सिमट कर शासकीय दफ्तरों के मेजों की शोभा बढ़ाती हैं। किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है "योजनाओं के निर्माण मात्र से ध्येय प्राप्ति हो जाती तो 'क्रियान्वयन' नामक शब्द का सृजन क्यों होता?" समस्त पाठक शायद इस तथ्य से सहमत होंगे कि विगत दिनों बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के सुन्दरलाल अस्पताल में हुयी असाधरण मौतों कि घटना केवल प्रशासनिक विफलता नहीं वरन् नैतिक दुर्बलता का प्रतीक है। सरकार के अगण्य लोक कल्याणकारी योजनाओं के निर्माण के बावजूद अव्यवहारिक प्रबन्धन व विफल क्रियान्वयन के कारण आज देश का गरीब वर्ग स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यक्ताओं का मोहताज है। इन सब विद्रूपतापूर्ण परिस्थितियों में चन्द स्वार्थी नेताओं के क्षणिक स्वार्थपूर्ति हेतु दिए जा रहे राजनैतिक द्वेषपूर्ण अनर्गल बयान वास्तव में विडम्बनापूर्ण हैं। राष्ट्र निर्माण के सबसे प्रबल केंद्र स्थल व आशाओं की राजधानी उ.प्र.में हुए इस अमानवीय घटना से हुयी मौत कोई सामान्य घटना नहीं वरन् यहूदियों के मृत्युदण्ड के सामान अत्यन्त बर्बर व पीड़ादायक है।

राष्ट्रप्रधान ने विगत गणतन्त्र दिवस के अवसर पर देश के केंद्रीय गौरव स्थल लाल किले से सम्बोधित कर पूरे आवाम को गोरखपुर जैसे हादसे की पुनरावृत्ति न होने का आश्वासन दिया था किन्तु राज्य के चुनिन्दा आरामपरस्त व किंकर्त्यवविमूढ़ नौकरशाहों ने लापरवाहपूर्ण रवैये से मानवता पुनः शर्मसार हो गयी। चन्द दिनों में ही प्रधानमन्त्री के आश्वासन रूपी वादों का का पुलिन्दा एक जर्जर पुल की भांति भरभराकर गिर गया। वर्तमान में प्रशासनिक स्तर में कुप्रबन्धन का आलम यह है कि व्यावसायिकता की गलाकाट स्पर्द्धा में स्वास्थ्य सेवाएं भौतिक विलासिता के साधनों की भांति आसमान छूती दरों पर बिक रही है। ऐसा नहीं है शासन निष्क्रिय है, सच तो यह है की जवाबदार पदासीनों के मानवीय दायित्वों को सांप सूंघ गया है। वर्तमान दयनीय दशा हेतु प्रसिद्ध गजलकार दुष्यन्त कुमार की चन्द पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं----

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरा मकसद है कि सूरत बदलनी चाहिए।

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