Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



भीष्‍म साहनी की रचनाशीलता में जीवनानुभव


आनंद दास


भीष्‍म साहनी का जन्‍म 8 अगस्‍त,1915 को पाकिस्‍तान के रावलपिंडी में हुआ था। उनके घर का माहौल आर्य समाजी था, पर घर में उग्र प्रकार की कट्टरता बिल्कुल नहीं थी। उनके पिता हमेशा प्रगतिशील सोच रखते थे, वे हमेशा मानते थे कि बच्‍चों का भविष्‍य आधु‍निक शिक्षा के सहारे ही अधिक उज्‍ज्‍वल हो पाएगा। जिनका प्रभाव भीष्‍म साहनी के जीवन और व्‍यक्तित्‍व पर पड़ा। भीष्‍म साहनी की प्रारंभिक शिक्षा गुरुकुल से शुरु हुई। गुरुकुल में साहनी जी को हिन्‍दी और संस्‍कृत का ज्ञान प्राप्‍त हुआ। उनका लगाव बचपन से ही शिक्षा के साथ अभिनय में था। साहनी जी ने अंग्रेजी में एम.ए. किए थे। एम.ए. कर परिवार के व्‍यापार और विरासत को पिता जी के साथ आगे बढ़ा रहे थे। परंतु कलाकार का मन भला व्‍यापार में कब लगता है। साहनी ने स्‍थानीय नाटक मंडली की स्‍थापना की। उनकी ऐसी मान्‍यता थी कि अगर कुछ समय व्‍यापार के साथ नाटक में व्‍यय किया जाए तो अंदर की उदासी को कम किया जा सकता है। साहनी को स्‍थानीय डी.ए.बी. कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाने का निमंत्रण आ पहुंचा जो उनके लिए स्‍वर्ण अवसर के समान था। कॉलेज में पढ़ाने के साथ-साथ उन्‍होंने कॉलेज में नाटक भी शुरू कर दिया। इस तरह साहनी ने एक साथ व्‍यापार, कॉलेज में पढ़ाना और नाटक खेलना शुरू कर दिए। भीष्‍म साहनी अपने जीवनगत अनुभवों एवं परिस्थितियों से प्रेरणा लेकर साहित्‍य की रचना की है। भीष्‍म साहनी का साहित्‍य उनका भोगा हुआ यथार्थ है। भीष्‍म साहनी की रचनाओं में एक ओर जहां तीखी प्रतिक्रिया और प्रतिरोध का स्‍वर है तो वहीं दूसरी ओर अन्‍तर्वेदना और मानवीय करुणा की अन्‍तर्धारा है। उनकी रचनाओं में मध्‍यवर्गीय चेतना के अन्‍तर्विरोध, स्‍त्री-जीवन की विडंबना, शिक्षित वर्ग के पाखण्‍ड, धार्मिक कट्टरता एवं सांप्रदायिक चेतना, स्‍त्री-चेतना की दिशा, हाशिए के लोगों की जीवन-स्थिति एवं संघर्ष-चेतना और शरणार्थी समस्‍या के साथ-साथ बदलते मानवीय संबंधों तथा युद्धविरोधी विचारों को प्रमुखता से अभिव्‍यक्‍त किया गया है। साइकोएनालिस्‍ट तथा सोशल फिलोसोफर, इरिच फ्रॉम (Psychoanalyst and social Philosopher, Erich Fromm) ने भी अपनी पुस्‍तक ‘द आर्ट आफ लभिंग’ (The art of loving) में स्‍पष्‍ट कहा है -"Modern man has transformed himself into a commodity, he experiences his life energy as an investment neith he should make the highest profit, considering his position and situation on the personality market……..Life has no goal except the one to move, no principle except the one of fair exchange, no satisfaction except the one to consume."1 भीष्‍म साहनी मामूली से मामूली इंसान के दु:ख-दर्द, मध्‍यवर्ग के चरित्र, उनके छद्म, उनकी स्‍वार्थान्‍धता तथा निम्‍न वर्ग की मजबूरियों में शामिल हो जाते हैं। उस परिवेश की विसं‍गति, अन्‍याय की तह में जाकर भीष्‍म जी उनके कारणों का विश्‍लेषण करते हैं, उन्‍हें सही परिप्रेक्ष्‍य में देखने का प्रयास करते हैं। इन्‍हीं सामान्‍य जीवनानुभवों के बीच उनकी संवेदना का निर्माण होता है। भीष्‍म जी समाज की दशा से चिंतित-विचलित रहते हैं। समाज का स्‍वार्थी और संवेदनहीन रवैया भीष्‍म साहनी को क्षुब्‍ध कर देता है। विष्‍णु प्रभाकर मानते हैं – ‘भीष्‍म साहनी बहुत ही संवेदनशील व्‍यक्ति हैं। इसका असर भी उनके साहित्‍य में देखने को मिलता है। उनके इस सरल और सौम्‍य व्‍यक्तित्‍व के कारण ही उन पर मार्क्‍सवाद उस रूप में हावी नहीं है, जैसा अन्‍य वामपंथी लेखकों में देखने को मिलता है।’ भीष्‍म साहनी ने अपनी रचनाशीलता के लिए जिस मानववादी दृष्टिकोण को अंगीकार किया, उसमें वैज्ञानिक चेतना के साथ श्रमजीवी समुदाय को समाजिक व आर्थिक शोषण से मुक्ति दिलाकर समानता और न्‍याय पर आधारित समाज के निर्माण एवं संघर्ष को महत्‍व देती है। भीष्‍म साहनी अपने शब्‍दों में कहते हैं-"साहित्‍य जीवन में ऐसे ही जन्‍म लेता है। साहित्‍य का जीवन के साथ अटूट संबंध है। लेकिन जीवन कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है, तरह-तरह के अनुभव, घटनाएं, आपसी रिश्‍ते, मानव समाज के भीतर चलने वाले संघर्ष, विसंगतियां और अंतर्विरोध, विडंबनाएं आदि सभी जीवन की परिधि में आते हैं। ये सब लेखक के संवेदन को कहीं छूते हैं, उद्वेलित करते हैं। इसी के आधार पर लेखक के संवेदन को, अभिव्‍यक्ति को दिशा मिलती है। लेखक के लिए जीवन सर्वोपरि है और मनुष्‍य भी अकेला नहीं है, वह भी मानव समाज का अंग है। मनुष्‍य को उसके समाज के परिप्रेक्ष्‍य में देखना उसे अधिक स्‍पष्‍टता और पूर्णता से देखना है।"2 साहनी जी ने जीवन-स्थितियों एवं परिवेश में बदलाव के साथ रचनाओं की संरचना में भी परिवर्तन किए हैं। भीष्‍म साहनी की रचनाओं में नाटकों की श्रृंखला इस प्रकार हैं – (1) हानूश (1977), (2) कबिरा खड़ा बाजार में (1981), (3) माधवी (1984) एवं (4) मुआवजा (1993) है। कहानी संग्रहों में - (1) भाग्‍यरेखा (1953), (2) पहला पाठ (1956), (3) भटकती राख (1966), (4) पटरियां (1973), (5) वाड़्चू (1978), (6) शोभायात्रा (1981), (7) निशाचर (1983), (8) पाली (1989) एवं प्रतिनिधि कहानियां हैं। उपन्‍यासों की अगर बात करें तो भीष्‍म जी की पहली उपन्‍यास (1) झरोखे (1967) है उसके बाद (2) कडि़यां (1970), (3) तमस (1973), (4) बसंती (1980), (5) मैयादास की माड़ी (1988) तथा (6) कुंतो (1993) है। एकमात्र निबंध संग्रह ‘अपनी बात’ (1989) तथा बाल साहित्‍य ‘गुलेल का खेल’ (1980) और ‘वापसी’ है।

आजादी के बाद हिंदी साहित्‍य को जिन रचनाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्‍यम से एक व्‍यापक फलक प्रदान किया है, उनमें भीष्‍म साहनी का महत्‍वपूर्ण योगदान है। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा आर्थिक विसंगतियों ने उन्हें अपने लेखन के लिए सामग्री प्रदान की है। समाज की भयावह स्थिति से अवगत कराने के लिए उन्‍होंने व्‍यंग्‍य और प्रहसन को ‘मुआवजे’ नाटक का माध्‍यम बनाया है। ‘मुआवजे’ में भारतीय जनता की यथार्थवादी तर्क का निर्माण तो हुआ ही है, इसके साथ ही नवोदित पूंजीवाद का सामाजिक प्रभाव, मध्‍यवर्ग का आन्‍तरिक अंतर्विरोध पुनरुत्‍थानवाद और आधुनिकतावाद के अंतर्विरोध क्रमश: स्‍पष्‍ट होते चले जाते हैं। रामविलास शर्मा लिखते हैं- "भीष्‍म साहनी जब ’मुआवजे’ में राजनीति, प्रशासन और गुण्‍डाराज की सत्‍ता का विमर्श रचते हैं तो उनकी दृष्टि जनता की बदलती मनोवृत्ति की भी गहराई से पड़ताल करती है जो छोटे-छोटे स्‍वार्थों के लिए तरह-तरह की चालाकियां बुनती रहती है। यह वह जनता नहीं है जिसके प्रति भीष्‍म साहनी ने अपने लेखन में सहानुभूति और संवेदना व्‍यक्‍त की है, जिनके हितों एवं मानवीय गरिमा के पक्ष में रचनात्‍मक प्रतिबद्धता दिखाई है।"3 मूल्‍यों का विघटन, अपसंस्‍कृति का फैलाव, पूंजीवादी-साम्राज्‍यवादी प्रवृत्तियों का छद्म वेश, मानवीय संवेदना की अपदस्‍थता, स्‍वार्थ का आधिपत्‍य, भ्रष्‍टाचार जैसी विसंगतियां कचोटने के कारण ही ‘मुआवजे’ में भीष्‍म साहनी ने व्‍यंग्‍य का सहारा लिया है।

भीष्‍म साहनी जी ने अपने व्‍यक्तिगत जीवनानुभवों को अपने साहित्‍य में उकेरकर हिन्‍दी साहित्‍य को अत्‍यधिक समृद्ध किया है। साहनी जी उच्‍च कोटि के उपन्‍यासकार, कहानीकार और नाटककार हैं यह विशेषता बहुत कम व्‍यक्तियों में देखने को मिलती है। राजेन्‍द्र यादव भीष्‍म जी के बारे में अपना विचार रखते हैं कि –"भीष्‍म में एक खास तरह का ठंडापन है जिसे कुछ लोग आलोचना करते वक्‍त एक यांत्रिक एप्रोच कहते हैं। इस बात‍ पर मुझे शिकायत है भीष्‍म से कि वे बहुत तीव्र आवेशों के कथाकार नहीं है, चाहे वह प्रेम भावना या मानवीयता हो। यही कारण है कि तमस की मां भी एक सामान्‍य, निरीह और असहाय बूढ़ी औरत है। इसलिए उसमें अलग में कुछ नहीं है, वो टाइप्‍ड ज्‍यादा हैं, व्‍यक्ति कम।"4 भीष्‍म जी की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये शुरू में ही पाठक को बांधकर अपने साथ बहा ले जाते हैं। पाठक ऊबते नहीं हैं बल्कि कथारस का आनंद लेते हुए यथार्थ का सहज साक्षात्‍कार करते हैं। वे उदासी, दु:ख, परेशानी झेलते चेहरे की एक-एक रेखा हमें दिखा देते हैं। वे एक ऐसे संवेदनशील रचनाकार के तौर पर सामने आएं हैं, जिसने हाशिए पर धकेले गए पात्रों की पीड़ा, अभावों, आकांक्षाओं को बारीकी से समझा और अंकित किया है। साहनी जी अपनी रचनाओं को शिल्‍प की जटिलता से बचाते हुए सादगी के साथ उनको ग्राह्य, सम्‍प्रेष्‍य एवं आत्‍मीय बना देते हैं। साहनी जी प्रेमचंद के बाद दूसरे ऐसे लेखक हैं जो कथावस्तु को वास्‍तविक जगत से उठाते हैं। प्रेमचंद की तरह उनके भी पात्र एक पूरे वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। सृजनात्‍मक प्रवृत्ति के अनुकूल यथार्थवादी शिल्‍प का गठन यदि प्रेमचन्‍द ने किया तो उसे सुदृढ़ रूप देने का काम भीष्‍म साहनी ने किया है। भीष्‍म साहनी जितने बड़े साहित्यकार व कलाकार हैं, उससे भी अधिक बड़े इंसान हैं। एक उम्‍दा किस्म के इंसान में जितनी खासियत होनी चाहिए, सारी की सारी उनमें हैं। साहनी जी के व्‍यक्तित्‍व और कृतित्व दोनों में ही सादगी की बहुलता है। उनमें कोई बनावटीपन नहीं है, यही कारण है कि वे समाज के सभी वर्गों के बीच अत्यन्त लोकप्रिय हैं।

संदर्भ-सूची


1. फ्राम इरिक, फ्राम इरिक, (Erich Fromm), The Art of loving, Forwarded by PETER D. KRAMER, हार्पर एण्‍ड ब्रादर प्रकाशन, पृष्‍ठ सं.- 97

2. सक्‍सेना राजेश्‍वर, ठाकुर प्रताप, भीष्‍म साहनी व्‍यक्ति और रचना, बातचीत-एक : असगर वजाहत, वाणी प्रकाशन, नई दिल्‍ली, प्रथम संस्‍करण 1997, पृष्‍ठ सं.- 10

3. सं.-कालजयी किशन, संवेद, अंक-1, जनवरी 2014, दिल्‍ली, रामविनय शर्मा, पृष्‍ठ सं.- 73

4. सारिका, 1990, नई दिल्ली, पृष्‍ठ सं.- 44

www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें