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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



पचास रूपये वाला बाबू


अंकित भोई 'अद्वितीय'


मोहन ने कक्षा 12वीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के पश्चात महाविद्यालय में प्रवेश हेतु गया। फार्म भरते समय जाति प्रमाण पत्र संलग्न करने के निर्देश दिए गए थे। ग्रामीण परिवेश में पला-बढ़ा भोला-भाला मोहन जाति प्रमाण पत्र बनाने हेतु शहर गया। तहसील ऑफिस में बाबू बैठा था, मोहन ने उसे जाति प्रमाण पत्र बनाने की बात कही तो बाबू ने उसे आज नहीं बन पाने की बात कह कर वापस लौटा दिया। रास्ते में कुछ लोगों ने गरीब मोहन को काम बनवाने का तरीका बताया और बाबू को "खर्चा-पानी" देने की सलाह दी। अगले दिन मोहन ने जाते ही बाबू को बीस रूपये का नोट थमा दिया तो बाबू ने तमतमाते हुए कहा- मैं बीस रूपये वाला बाबू दिखता हूँ क्या? मोहन ने भी थोडा साहस दिखाते हुए कहा- तो तुम कितने रूपये वाले बाबू हो? बाबू ने बेशर्मी की सभी हदों को पार करते हुए कहा- "मैं पचास रूपये वाला बाबू हूँ।"

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